बिस्मिल्लाहिर्रहमानीर्रहीम
अस्सलाम अलैकुम व रहमतुल्लाह बरकातहु
इस्लाम में कबरों की अहमियत
नोट - नीचे लिखी हुई सारी अहादीस इन्टरनेशनल हदीस नम्बर के मुताबिक लिखा गया है। तहकीक और इत्मिनान के लिए Google गूगल सर्च में हदीस का नाम और दिया गया हदीस नम्बर लिखकर सर्च करके सारी हदीसों को पढ़ा जा सकता है।
➤ इस्लाम में कबर की अहमियत सिर्फ इतनी है कि उसकी जियारत से आखिरत और मौत की याद दिलाने के लिए इजाज़त मिली है। इससे पहले तो जियारते कबूर बिल्कुल मना ही था। जब इस्लाम फैल कर ईमान में मज़बूती आ गई तब इजाज़त मिली वह भी शर्त ये लगी कि आखिरत और मौत याद करने के लिए न कि फैज व मुरादे पूरी करने के लिए। हदीस दर्ज जेल है -
☞ ह0 अबूहुरैरा रजि0 से रिवायत है कि रसू0स0 ने अपनी मां की कबर की जियारत की आप स0 रोये और अपने इर्द गिर्द वालों को भी रुलाया फिर फरमाया मैने अपने रब से इजाज़त मांगी कि मैं इनके लिए बख्शिश तलब करूँ तो मुझे इजाजत नही दी गई और मैने इजाज़त मांगी कि मैं इनकी कबर की जियारत करूँ तो उसने मुझे इजाज़त दे दी। पस तुम भी कबरों की जियारत किया करो क्योंकि वह तुम्हें मौत की याद दिलाती है। (सहीह मुस्लिम 2259, अबूदाउद 3234, सनन निसाई 2036, इब्ने माजा 1569, 1572)
☞ रसू0स0 ने फरमाया कि मैं तुम को कबरों की जियारत करने से मना फरमाया था लेकिन अब रसू0स0 की मां की कबर की जियारत की इजाज़त हुई सो तुम भी कबरों की जियारत करो कि वह आखिरत की याद दिलाती है। (तिर्मिजी 1054, अबूदाउद 3235)
☞ ह0 अब्दुल्लाह बिन मसूद रजि0 से रिवायत कि रसू0स0 ने फरमाया मैने तुम्हें कबरों की जियारत से मना किया था तो अब कबरों की जियारत किया करो क्योंकि वह दुनिया से बेरगबती पैदा करती है और आखिरत की याद दिलाती है। (इब्ने माजा 1571)
➤ इजाज़त मिलने के बाद रसू0स0 ने कबर की जियारत करने के लिए दुआ भी सिखाई जिससे पता चलता कि हम अहले कबूर के लिए दुआ करें न कि उनसे ही दुआ माँगना शुरू कर दें। हदीस मुलाहिजा हो -
☞ ह0 इब्ने अब्बास रजि0 ने कहा कि रसू0 स0 ने मदीना की कब्रों की तरफ अपना मुंह करके कहा (अस्सलामु अलैकुम या अहलल कबूर यग्फिरुल्लाहो लना व लकुम अन्तुम सलफुना व नहनू बिल असरे) तर्जुमा- सलाम है तुम पर ऐ कबर वालों अल्लाह तआला बक्शे हमको और तुमको , तुम हमारे पेशखेमा हो हम तुम्हारे पीछे हैं। (तिर्मिजी 1053)
☞ ह0 बरीदा रजि0 से रिवायत है कि रसू0स0 कब्रस्तान के लिए यह दुआ पढ़ने की तालीम दी।- (अस्सलामु अलैकुम अहलद्दियारे मिनल मोमिनीना वल मुसलिमीना व इन्ना इन्शाअल्लाहुबिकुम ललाहिकूना नसअलुल्लाह कूना वलकुमुल आफियता ) तर्जुमा- सलामती हो मोमिन और मुसलमान घरवालों तुम पर, और बेशक अल्लाह ने चाहा तो हम भी तुम्हारे साथ मिलने वाले हैं। हम अपने और तुम्हारे लिए अल्लाह से आफियत का सवाल करते हैं। (सहीह मुसलिम 2257)
➤ रसू0स0 ने कबरों के हवाले से बहुत सारी तल्कीन भी करते रहते। हदीस दर्ज जेल है -
☞ हजरत जाबिर रजि0 से रिवायत हैं कि नबी स0 ने कबरों को पुख्ता करने, चूनागच करने, इस पर लिखने, इमारत बनाने और इस पर चलने और बैठने से मना फरमाया है। (सहीह मुस्लिम 2245, तिर्मिजी 1052, अबूदाउद 3225, इब्ने माजा 1562, 1563, सनन निसाई 2029, 2030, 2031)
☞ ह0 अबू सईद रजि0 से रिवायत है कि रसू0स0 ने कबर पर कोई चीज तामीर करने से मना फरमाया। (इब्ने माजा 1564)
☞ ह0 अबूमुर्सिद गनवी रजि0 से रिवायत है कि रसू0स0 ने फरमाया क़ब्रों पर न बैठो और न उनकी तरफ (रुख करके) नमाज पढ़ो। (सहीह मुस्लिम 2250, अबूदाउद 3229)
☞ ह0 अबूहुरैरा रजि0 से रिवायत है कि रसू0 ने फरमाया तुममें से किसी शख्स का अंगार पर बैठना जिससे कपड़े जल जायें। कबर पर बैठने से बेहतर है। (सनन निसाई 2046, इब्ने माजा 1566)
☞ ह0 उमर बिन हजम रजि0 से मरवी है कि रसू0 ने फरमाया कबरों पर मत बैठो। (सनन निसाई 2047)
➤ जमाना जाहिलियत में यहूदियों और नसरानियों की आदत थी कि वह अपने अम्बिया और नेक बुजुर्गो की कबरों को पक्की कर लेते और सज्दागाह बना लेते। यह देखकर नबी स0 ने अपने असहाब को हिदायत करते रहते थे। हवाला पेश है -
☞ हजरत आयशा रजि0 कहती हैं कि एक बार उम्मे हबीबा रजि0 और उम्मे सलमा रजि0 ने हुजूर स0 से एक गिरजा का जिक्र किया जिसमें तस्वीर थी जिसे हब्शा में दोनों ने देखा था। आप स0 ने फर्माया उन लोगों में जब कोई नेक आदमी मर जाता था तो उसकी कब्र पर मस्जिद बना लेते थे और यह तस्वीर बनाते थे। कयामत के दिन ये लोग खुदा के नजदीक सारी मख्लूक से ज्यादा बुरे होगे। (सहीह बुखारी 427, 434, 1341, 3873, मुस्लिम 1181, मिश्कात 4508)
☞ ह0 जन्दब रजि0 ने कहा- मैने नबी स0 को आप की वफात से पाँच दिन पहले यह कहते हुए सुना ‘‘मै अल्लाह तआला के हुजूर इस चीज से बरात का इज़हार करता हूं कि तुममें से कोई मेरा खलील हो क्योंकि अल्लाह तआला ने मुझे अपना खलील बना लिया है जिस तरह उसने इब्राहीम अलै0 को अपना खलील बनाया था। अगर मै अपनी उम्मत में से किसी को अपना खलील बनाता तो अबूबकर को खलील बनाता। खबरदार तुमसे पहले लोग अपने अंम्बिया और नेक लोगों की कबरों को सज्दागाहें बना लिया करते थे। खबरदार! तुम कबरों को सज्दागाहें न बनाना। मै तुमको इससे रोकता हूं। (सहीह मुस्लिम 1188)
➤ इसी तरह औरतों को भी नबीस0 ने बड़ी सख़्ती से कबरों की जियारत करने से रोका। बाद में औरतों को भी जियारते कबूर के लिए पूरी छूट तो नही दी पर कभी-कभार सिर्फ मौत की याद के लिए कबर की जियारत करने में कोई हरज नही। नबी स0 ने ह0 आयशा रजि0 जियारते कबूर की दुवा भी सिखाई है। हदीस ये है - ह0 आयशा रजि0 बयान करती हैं कि मैने अर्ज किया अल्लाह के रसू0स0! जियारत कबूर के मौके पर मै कैसे दुवा करूं? आप स0 ने फरमाया यह दुवा करें ‘‘मोमिन और मुसलमान घर वालों पर सलामती हो। अल्लाह हमसे आगे जाने वालों और हमसे पीछे रह जाने वालों पर रहम फरमाये। और अगर अल्लाह ने चाहा तो बेशक हम भी तुमसे मिलने वाले हैं।’’ (सहीह मुस्लिम 2256, मिश्कात 1767)
☞ ह0 आयशा रजि0 से मरवी है कि मेरे हुजरे में जहां रसू0स0 और मेरे वालिद की कबरें थी वहां अपने सर पर दुपट्टा न होने की हालत में भी चली जाती थी क्योंकि मैं समझती थी कि यहां सिर्फ मेरे सौहर और मेरे वालिद ही तो हैं। लेकिन जब ह0 उमर रजि0 की भी वहां तदफीन हुई तो बखुदा ह0 उमर की हया की वजह से मै जब भी वहां गई तो अपनी चादर अच्छी तरह लपेट कर ही गई। (मसनद अहमद 26179, मिश्कात 1771)
☞ ह0 अब्दुल्लाह बिन अबी मलाइका फरमाते हैं कि एक दिन हजरत आयशा रजि0 कब्रस्तान की तरफ से तशरीफ ला रही थी। मैने अर्ज किया ऐ उम्मुलमोमनीन! आप कहां से तशरीफ ला रही हैं? फरमाने लगीः अपने भाई अब्दुर्रहमान बिन अबूबकर की कबर पर गई थी। मैने कहाः क्या रसू0स0 ने कबरों की जियारत से मना नही फरमाया था। कहने लगीः आप स0 ने मना फरमाया था लेकिन बाद में इजाजत दे दी थी। (बैहकी 7207, हाकिम 1392)
☞ ह0 जाफर अपने वालिद (ह0 बाकर) के हवाले से उनके वालिद (ह0 जैनुल आबदीन रजि0) का बयान नकल करते हैं। उनके वालिद हजरत हुसैन रजि0 फरमाते हैं ह0 फातिमा रजि0 अमूमन नबी स0 के चचा ह0 हम्जा बिन अब्दुल मुत्तलिब रजि0 की कबर की जियारत के लिए जाया करती थी और दुआए मग्फिरत करती और आंसू बहाती। ( हाकिम 4319, बैहकी 7208)
➤ औरत कभी-कभार कबर की जियारत तो कर सकती हैं लेकिन बकसरत और बेपर्दा कबर की जियारत करना मना है -
☞ ह0 अबूहुरैरा रजि0 से रिवायत है कि रसू0स0 ने लानत की उन औरतों पर जो कबरों की जियारत को जाएं। (तिर्मिजी 1056)
☞ ह0 हसान बिन साबित रजि0- ह0 अब्दुल्लाह बिन अब्बास रजि0- ह0 अबूहुरैरा रजि0 से रिवायत है उन्होंने फरमाया कि अल्लाह के रसू0स0 ने कबरों की बकसरत जियारत करने वाली औरतों पर लानत फरमाई है। (इब्ने माजा 1574, 1575, 1576)
☞ हजरत इब्ने अब्बास रजि0 से रिवायत है कि रसू0स0 ने कबरों की जियारत करने वाली औरतों पर लानत फरमाई है और कबरों पर मस्जिद बनाने और चिराग जलाने वालों पर भी लानत फरमाई है। (तिर्मिजी 320, अबूदाउद 3236, सनन निसाई 2045, मसनद अहमद)
➤ रसू0स0 अपनी कबर के लिए डरते थे कि कही लोग मेरी कबर को भी सज्दागाह न बना ले इसलिए अल्लाह से दुआ करते कि अल्लाह मेरी कबर को बुत या सज्दागाह न बनने देना। और लोगो को भी वसीयत किया करते थे। हदीस मुलाहिजा हो -
☞ ह0 अबूहुरैरा रजि0 से मरवी है कि रसू0स0 यह दुआ फरमाते थे कि ऐ अल्लाह! मेरी कबर को बुत न बनने देना। उनपर अल्लाह की लानत हो जो अपने अम्बिया की कबरों को मसजिद (सज्दागाह) बना लेते हैं। (मसनद अहमद 7352)
☞ रसू0स0 ने दुवा की- या अल्ला मेरी कबर को बुत न बनाना जिसे लोग पूजना शुरू कर दें। उन लोगों पर अल्लाह का सख़्त ग़जब और कहर नाजिल हो जिन्होने अपने अम्बिया की कबरों को इबादतगाह बना लिया। (मूता इमाम मलिक)
☞ हजरत जैनुल आबदीन बिन हुसैन बिन अली रजि0 ने एक शख्स को नबी स0 की कबर के इर्द गिर्द बनी दीवार में एक सगाफ के अन्दर दाखिल होकर कबर के पास दुवा करते हुए देखा तो इसे रोक दिया और फरमाया, क्या मैं तुझे वह हदीस न बताऊं जो मेरे बाप (हुसैन रजि0) ने मेरे दादा (हजरत अली रजि0) से और उन्होने रसू0स0 से सुनी थी। आप ने फरमाया था मेरी कबर को मेलागाह न बनाना और तुम (नमाज, तिलावत तर्क करके) अपने घरों को कब्रस्तान न बनाना और मुझपर दरूद पढ़ते रहना। इसलिए कि तुम जहां भी रहोगे तुम्हारा दरूद मुझे पहुंच जायेगा। (मुख्तारा)
☞ ह0 अबूहुरैरा रजि0 से मरवी है कि रसू0स0 ने फरमाया अपने घरों को कबरस्तान मत बनाओ और न मेरी कबर को ईद (मेलागाह) बनाओ और मुझ पर दरूद पढ़ो। तुम जहां कहीं भी होगे तुम्हारा दरूद मुझको पहुंच जायेगा। (अबूदाउद 2042)
➤ शायद यही वजह रही हो कि रसू0 स0 कब्रों को पक्की और ऊंची करने और कब्रों पर चिराग जलाने से मना करते थे कि मेरे बाद लोग क़ब्रों की ही वजह से गुमराह न हो जायें बल्कि पेशीनगोई भी की है कि -
☞ ह0 अबूसईद खुदरी रजि0 रिवायत करते हैं कि रसू0स0 ने इर्शाद फरमाया यकीनन तुम भी पहले लोगों के तरीको के पीछे चल पड़ोगे जिस तरह बालिस्त-बालिस्त के साथ और हाथ-हाथ के साथ। हत्ता कि अगर पहले लोगों ने किसी गोह के सुराख में दाखिल होने का काम किया तो तुम भी पीछे चलोगे। पूछा गया या रसू0स0 उन पहले लोगो से मुराद क्या यहूदी और नसरानी हैं? तो आप स0 ने फरमाया अगर वह नही तो फिर कौन मुराद हैं। (सहीह बुखारी 3456,7320, सहीह मुस्लिम 6781, मिश्कात 5361)
☞ रसू0स0 ने फरमाया सबसे बदतरीन वह होगे जिन पर क़यामत कायम होगी और वह भी जो कबरों को मस्जिद का दरजा दें। (मसनद अहमद)
☞ ह0 अली रजि0 ने अबुलहयाज असदी से फरमाया कि मैं तुमको भेजता हूं उस काम के लिए जिसके वास्ते नबी स0 ने मुझको भेजा था कि न छोड़े तू कोई ऊंची कब्र जमीन के बराबर किये बगैर और न छोड़े किसी तश्वीर या मुजस्समे को बिना मिटाये। (सहीह मुस्लिम 2243, तिर्मिजी 1049 अबूदाउद 3218, सनन निसाई 2033)
☞ समामा बिन सुफी ने बयान किया, कहा हम सरजमीने रोम के जजीरा रोदस में ह0 फजाला बिन उबैद रजि0 के साथ थे कि हमारा एक दोस्त वफात पा गया। ह0 फजाला बिन उबैद रजि0 ने उनकी कबर के बारे में हुक्म दिया तो उसको बराबर कर दिया गया। फिर उन्होने कहा मैने रसू0स0 से सुना है कि आप कबरों को जमीन के बराबर करने का हुक्म देते थे। (सहीह मुस्लिम 2242, अबूदाउद 3219, सनन निसाई 2032)
☞ ह0 उसमान बिन मजउन रजि0 की वफात हुई। दफन के बाद रसू0स0 ने सर की तरफ एक पत्थर रख दिया और फरमाया मै इससे अपने भाई की कबर पहचान सकूँगा और मेरे अहल मे से जो कोई फौत हुआ मैं उसे इसके करीब दफ़न करूँगा। (अबूदाउद 3206, इब्ने माजा 1561)
➤ नबी पाक स0 की वफात का वक्त जब करीब आया और मर्ज में मुब्तला हुए तो आप स0 उम्मुल मोमिनीन हजरत आयशा रजि0 के घर (हुजरा) में ही रहने लगे। बीमारी की शिद्दत बढ़ी तो आप स0 चादर ओढे़ लेटे थे। जब चादर में आपका चेहरा मुबारक रखना नागवार गुजरता तो आप स0 चादर से अपना चेहरा बाहर निकालते और फरमाते। हदीस पढ़ें -
☞ हजरत आयशा रजि0 और इब्ने अब्बास रजि0 से रिवायत है कि हुजूर स0 की वफात का वक्त करीब हुआ तो आप चेहरे मुबारक पर काली चादर डालने लगे, मगर जब नागवार हुआ तो खोल दिया और फर्माया यहूद व नसारा पर अल्लाह की लानत हो जिन्होंने अपने अम्बिया की कबरों को मस्जिद बना लिया। आप स0 डराते थे कि कहीं अपने लोग भी ऐसा न करें। (सहीह बुखारी 3453, 435, 436, सहीह मुस्लिम 1187)
☞ उम्मुल मोमनीन ह0 आयशा रजि0 से रिवायत है कि रसू0 स0 ने फरमाया- उस बीमारी में जिस के बाद फिर तंदरुस्त नही हुए, अल्ला की लानत हो यहूद व नसारा पर कि उन्होंने अपने अम्बिया की कबरों को सजदागाह बना लिया। ह0 आयशा रजि0 ने कहा अगर रसू0 स0 को इस बात का ख्याल न होता तो आप स0 की कबर खुली जगह में होती। हुजरा में न होती मगर आप स0 डरे कि कहीं लोग आप स0 की कबर को सजदागाह न बना लें। (सहीह बुखारी 435, 436, 1330,1390, 3453, 4435, 4436, 4441, 4443, 4444, 5815, 5816, सहीह मुसलिम 1183,1184, 1187, 1188, मिश्कात 712, 713 )
☞ हजरत अबूहुरैरह रजि0 कहते हैं कि मैने रसू0स0 ने फरमाया यहूद व नसारा पर अल्लाह की लानत हो उन्होंने अपने अंम्बिया की कबरों को मसजिद बना लिया। (सहीह बुखारी 437, मुस्लिम 1185, अबूदाउद 3227, सनन निसाई 2049)
☞ ह0 आयशा रजि0 से रिवायत है कि रसू0 स0 ने फरमाया- अल्लाह तआला उन लोगों (यहूद व नसारा) पर लानत फरमाये जिन्होंने अपने अम्बिया की कबरों को सज्दागाह बना लिया। (सनन निसाई 2048)
➤ बहुत अफसोस की बात है कि नबी पाक स0 आखिरी वक्त में क्या तालीम दी जिसे हम मुसलमां इस पर तवज्जो ही नही देते। मौत के वक्त कोई क्या वसीयत करता है। क्या कभी हम सोचते हैं। हमारे नबी वफात से पहले वसीयत कर रहे हैं कि कबरों को सज्दागाह न बनाना। फिर भी हम मुसलमान ही कबरों को सज्दागाह बनाने का इन्तजाम करते हैं कबरों को मजार बनाकर। मुजावर बनकर। गुम्बद बनाकर। फूल और चढ़ावा चढ़ाकर। अगर वाकई कबर की कुछ अहमियत होती तो सबसे पहले हजरत अली रजि0 नबी पाक स0 की कबर के मुजावर बनते। हजरत अबूबकर रजि0 तो खलीफा थे उनको तो चाहिए था कि वो नबी स0 की कबर पर उम्दा इमारत तामीर करवाते। ह0 उमर रजि0 रोज चादर चढ़ाते और ह0 उस्मान रजि0 चढ़ावा चढ़ाते और फैज हासिल करते। पर नही किया। क्योंकि उनको पता था ये सब नबी स0 के तालीम के खिलाफ हैं। अब तो ये सब जानते हैं इस दुनिया में सबसे अफजल व आला अगर कोई हैं तो वह हैं हमारे नबी स0। जब इनकी कबर मुबारक पर यह सब अमल नही तो औरों पर क्यों?
गलतफहमियां -
➤ कुछ लोग कबर और मजार पर फूल चढ़ाने के लिए नीचे दी गई हदीस का हवाला देते हैं। इस हदीस में उस कबर का जिक्र है जिसमें अजाब हो रहा था। नबी स0 टहनी गाड़ी और शायद या उम्मीद का लफ्ज इस्तेमाल करके कहा कि टहनी खुश्क होने तक अजाब कम रहेगा। पर ये काम सिवाए मग्फिरत की दुवा के दुबारा कही नही किया न किसी सहाबी ने किया।
☞ हजरत इब्ने अब्बास रजि0 कहते हैं कि हुजूर स0 दो कबरों पर से गुजरे तो आप ने फरमाया इन दोनों पर अजाब हो रहा है और किसी बड़ी बात पर अजाब नही हो रहा है। एक तो इनमें से पेशाब के छींटो से न बचता था और दूसरा चुगुलखोरी करता था। फिर आप ने एक तर (हरी) शाख ली और इसे चीरकर दो टुकड़े कर दिये और दोनों कबर पर एक-एक टुकड़ा गाड़ दिया। सहाबा रजि0 ने अर्ज किया या रसू0स0 यह आपने क्यूं किया? फरमाया उम्मीद है कि जब तक यह दोनों शाखें खुश्क नही हो अजाब उन पर कम हो जाय। (सहीह बुखारी 216, 218, 1361, 1378, 6052, 6055 सही मुस्लिम 677)
➤ कुछ लोग मजार के लिए नीचे दी गई हदीस का हवाला देते हैं और कहते नबी स0 का मजार सहाबा के दौर में ही तामीर हुआ। जबकि नबी स0 की वफात ह0 आयशा रजि0 के हुजरा में हुई और वही दफन भी हुए। हुजरे की दीवार पहले से मौजूद थी। हदीस पढ़ें -
☞ ह0 आयशा रजि0 कहती हैं नबी स0 की कबर खुले में रखती। अगर डर न होता कि लोग कबर को सज्दागाह बना लेगें।
वलीद बिन अब्दुल मलिक बिन मरवान के अहद हुकूमत में (नबीस0 और ह0 आयशा रजि0 का हुजरा मुबारक जिसमें आप स0 का कबर मुबारक है) की दीवार गिर गई तो लोगों ने उसे दुबारा उठाया। (सहीह बुखारी 1390)
➤ कुछ लोग गुम्बदे खिजरा को कहते हैं कि गुम्बद बना है। जबकि ये नबी स० के दौर से 600 साल के बाद बना है। अब ये दीन थोड़ी ही हो गया कि इस पर अमल किया जाय। नबी स0 के बाद सहाबा का दौर गया ताबईन का दौर गया तबेताबईन का दौर गया। किसी ने भी नबी स0 के कबर पर इमारत तामीर नही की। अब फैसला खुद करें कि हमें किसके तरीके पर चलना है। गुम्बद की तामीर मिस्र के बादशाह 678 हि0 में लकड़ी का बनवाया था। वैसे यह नबी स0 के लिए था तो क्या नबी स0 की बराबरी करना अकलमंदी है?
☆ अल्लाह हम सब को नबी स0 के बतलाये हुए रास्ते पर चलने की तौफ़ीक़ अता फरमाए। आमीन ! ☆

बहुत अच्छा जजाक अल्लाह खैर
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