बिस्मिल्लाहिर्रहमानीर्रहीम
अस्सलाम अलैकुम व रहमतुल्लाह बरकातहु
अल्लाह से मदद और वसीला
वसीला के माने ऐसी चीज के हैं जो किसी मकसूद के हुसूल या इसके कुर्ब का जरिया हो। अल्लाह तआला की तरफ वसीला तलासने का मतलब होगा ऐसे आमाल अख्तियार करना जिससे अल्लाह राजी हो जाय। जो भी जरिया अल्लाह का कुर्ब हासिल करने के लिए अख्तियार किया जाये उसे ही वसीला कहते हैं।
ऐ लोगों जो ईमान लाए डरते रहो अल्लाह से और तलाश करते रहो इसका वसीला (कुर्ब) और जिहाद करो उसकी राह में ताकि तुम कामयाब हो जाओ। (5.मायदा आ0 35)
वसीला की दो ही जायज सूरतें हैं एक ये कि किसी नेक जिन्दा शख्स को अपनी दुवा की कबूलियत के लिए वसीला बनाया जाये। और दूसरी सूरत अपने ही नेक आमाल को वसीला बनाया जाये। हदीस नीचे दर्ज है -
ह0 अनस बिन मालिक रजि0 फरमाते हैं कि ह0 उमर रजि0 के जमाने में जब कहत (सूखा) पड़ता तो सय्यदना अब्बास के वसीले से दुआ करते और कहते या अल्लाह पहले हम तेरे पास अपने पैगम्बर का वसीला लाया करते तो तू पानी बरसाता था। अब अपने पैगम्बर के चचा का वसीला लाये हैं हम पर बारिश बरसा। फिर बारिश हो गई। (सहीह बुखारी 1010)
अब्दुल्लाह बिन उमर रजि0 बयान करते हैं कि नबी स0 ने फरमाया तीन शख्स कहीं बाहर जा रहे थे कि बारिश होने लगी थी तो एक गार में पनाह ली। एक चट्टान लुढ़ककर गार के मुंह पर ढक जाता है। अब तीनों एक दूसरे से कहा कि अपने सबसे अच्छे अमल का जो तुमने कभी किया हो नाम लेकर अल्लाह से दुवा करो। फिर एक ने दुवा की ऐ अल्लाह मेरे मां बाप बहुत ही बूढ़े थे। मैं बाहर ले जाकर अपने मवेशी चराता था। फिर जब शाम को वापस आता तो इनका दूघ निकालता और बरतन में पहले अपने वालदैन को पेश करता। फिर अपने बीबी बच्चों को पिलाता। एक रात घर लौटा तो वालदैन सो चुके थे तो जगाना मुनासिब न समझा और दूध का प्याला लिए खड़ा रहा कि सुबह हो गई। ऐ अल्लाह ये सब मैने तेरी रजा के लिए किया। तो तू इस पत्थर को इतना हटा दे कि हम आसमान को देख सकें। चुनांचे वह पत्थर कुछ हट गया। अब दूसरे शख्स ने दुवा की ऐ अल्लाह तू जानता है कि अपने चचा की लड़की से बेइंतहा मुहब्बत की। पर उसने कहा तुम 100अशरफी दिए बगैर अपनी ख्वाहिश नही पूरी कर सकते। फिर मैने अशरफी जमा की। और उसक पास बैठा तो वह बोली अल्लाह से डर और महर को नाजायज तरीके पर न तोड़। इस पर मै खड़ा हो गया और उसे छोड़ दिया। ये सब तेरी रजा के लिए किया तो तू हमारे निकलने का रास्ता बना दे। फिर थोड़ा और पत्थर खिसक गया। अब तीसरे शख्स ने दुवा की ऐ अल्लाह तू जानता है कि मैने एक मजदूर से कुछ ज्वार पर काम कराया था। जब मजदूरी देने लगा तो उसने लेने से मना कर दिया तो मैने उस ज्वार को बो दिया।(जो पैदा हुआ) उससे एक बैल और एक चरवाहा खरीदा। कुछ दिन बाद मजदूर ने मजदूरी मांगी तो बैल और चरवाहे देने लगा तो कहा क्यों मजाक करते हो तो मैने कहा मैं मजाक नही कर रहा ये तेरे ही हैं। ये तेरी रजा के लिए किया था तो तू हमारे लिए रास्ता बना दे। चुनांचे गार पूरा खुल गया। और तीनों बाहर आ गये। (सहीह बुखारी 2215, 2272, 2333, 3465, 5974, सहीह मुस्लिम 6949)
ऊपर हदीस से दो सूरत तो बिल्कुल वाजेह है कि नेक आमाल के जरिए वसीला लगाकर अल्लाह से मांगा जाय। ऐसे और भी सूरतें हैं जिसके जरिए अल्लाह से वसीला बनाया जा सकता है। कुछ सूरतें दर्ज जेल हैं -
इब्ने अब्बास रजि0 ने बयान किया कि रसू0 स0 हसन और हुसैन रजि0 के पनाह तलब किया करते थे और फर्माते थे कि तुम्हारे बुजुर्ग दादा (इब्राहीम अलै0) भी इन कलिमात के जरिये अल्लाह की पनाह इसमाइल और इश्हाक अलै0 के लिए मांगा करते थे। ‘‘मै पनाह मागता हूं अल्लाह के पूरे पूरे कलमात के जरिये हर एक शैतान से और हर जहरीले जानवर से और नुकसान पहुचाने वाली नजरे बद से। (सहीह बुखारी 3371)
सय्यदना अब्दुल्लाह बिन उमर बिन आस रजि0 का बयान है कि उन्होने रसू0स0 को फरमाते सुना है कि जब मोवज्जिन की अजान सुनो तो तुम वही कहो जो मोवजिन कहता है फिर मुझ पर दरूद पढ़ो क्योंकि जो कोई मुझ पर एक मर्तबा दरूद पढ़ता है तो अल्लाह इस पर अपनी दस रहमतें नाजिल फरमाता है। इसके बाद अल्लाह तआला से मेरे लिए वसीला मांगो क्योंकि वसीला दरअसल जन्नत में एक मुकाम है जो अल्लाह के बन्दों में से एक बन्दा को दिया जायेगा और मुझे उम्मीद है कि वह बन्दा मैं ही हूंगा और जो कोई मेरे लिए वसीला तलब करेगा उसके लिए मेरी सफाअत वाजिब हो जाएगी। (सहीह मुस्लिम 849)
एक नाबीना नबी स0 के पास आकर अर्ज किया आप मेरे लिए अल्लाह तआला से सेहत व आफियत की दुवा फरमा दीजिए। आप स0 ने उसे हुक्म दिया कि वह अच्छी तरह वजू करे और दो रकात नमाज पढ़े इसके बाद यह दुवा करे। ‘‘ऐ अल्लाह मै तुझ से सवाल करता हूं और तेरी तरफ तवज्जो करता हूं मुहम्मद स0 के साथ जो नबी रहमत हैं। ऐ मुहम्मद! मैने आप के जरिए से अपने रब की जानिब इस काम में तवज्जो की ताकि पूरा हो जाय, ऐ अल्लाह! तू मेरे हक में इनकी सफाअत कबूल फरमा’’ (इब्ने माजा 1385)
फरमाया रब ने कि मुझे पुकारो मै तुम्हारी दुवा कबूल करूँगा। (40.मोमिन आ0 60)
और अल्लाह ही के लिए हैं सब अच्छे नाम तो पुकारा करो उसको उन्हीं नामों से।(7.आराफ आ0 180)
ह0 साबित बनानी रजि0 से रिवायत है कि नबीस0 ने फरमाया कि तुममे से हर शख्स अल्लाह ही से अपनी हाजत मागे यहां तक कि नमक का भी और अपने जूते के तस्मे का भी जब वह टूट जाए। (तिर्मिजी 3604/10, इब्ने हिब्बान 866)
हजरत इब्ने अब्बास रजि0 फरमाते हैं मैं एक दिन रस0स0अ0 के साथ सवारी पर पीछे था कि आप स0 ने फरमाया। लड़के मैं तुझे चन्द बातें सिखाता हूं तू इनकी हिफाजत कर अल्ला तेरी हिफाजत करेगा। अल्लाह के हुक्म की हिफाजत कर तू अल्ला को अपने रूबरू पायेगा और जो कुछ मांगना हो तो अल्लाह ही से मांग। अगर मदद तलब करनी हो तो अल्लाह ही से मदद तलब करो। और जान ले अगर सारी उम्मत इस बात पर जमा हो जाय कि तुझे कुछ नफा पहुंचाना चाहे तो यह तुझे इतना ही नफा पहुंचा सकते हैं जितना अल्लाह ने तेरे लिए लिख दिया है और अगर सब मिलकर तुझे नुकसान पहुंचाना चाहें तो इतना ही नुकसान पहुंचा सकेगें जितना कि अल्लाह ने लिख दिया है। कलम उठा लिए गये और किताब खुश्क हो गई। (तिर्मिजी शरीफ 2516, मिश्क़ात 5302)
सूरत कोई भी अख्तियार करें वह नेक आमाल के जरिए, नेक जिंदा लोगों के जरिए, नेक वास्ता दे कर या किसी और जायज तरीके से लेकिन मांगना हर हाल में अल्लाह ही से है। पुकारना अल्लाह ही को है। मसलन अगर कोई कहे ऐ फलां (फौत सुदा) बुजुर्ग,नबी मेरी मदद कर। अब ये नाजायज तरीका हुआ। हां इस को इस तरह कहे कि ऐ अल्लाह फला नेक आमाल या फला बुजुर्ग या नबी के वसीले से मेरी मदद कर। यह जायज और दुरुस्त है। क्योंकि गैरअल्लाह को पुकारना मुशरिकीन का काम था।
मददगार सिर्फ अल्लाह
कुछ लोग मदद के नाम पर जाहिलाना दिमाग लगाते हैं और कहते हैं कि गैर अल्लाह से मदद नही मांग सकते तो दूसरों से (यानी जिन्दा लोगों से) मदद क्यों लेते हो अल्लाह ही से क्यों नही मांगते। तो वही बताएं कि अगर हाथ टूट जाये तो मौजूदा डाक्टर के पास जायेगे या किसी कब्र पर। तो भाई ये तो इन्सानी फितरत है कि हर इन्सान एक दूसरे की मदद करता है। इसी तरह अल्लाह ने हर फरिस्ते की मुख्तलिफ कामों की मुख्तलिफ जगहों पर ड्यूटी लगाई है। अब बारिश के लिए हम अल्लाह से दुवा करेगे या बारिश वाले फरिश्ते से। हर हाल में अल्लाह ही को पुकारेगे। क्योंकि हर फरिश्ते अल्लाह का मोहताज और खौफ रखने वाले हैं बिना अल्लाह के इजाजत वह अपनी मरजी से कुछ नही करते।
जिन्हें तुम पुकारते हो वह खुद अल्लाह का वसीला (जरिया) तलाश करते हैं ज्यादा करीब होने का और रहमत की उम्मीद और खौफ रखते हैं इसके अजाब का। बेशक अल्लाह का अजाब डरने लायक है। (17.बनी इसराईल आ0 57)
जिन्हें तुम अल्लाह के सिवा पुकारते हो उन्हें न तुम्हारी मदद करने की ताकत हासिल है और न अपनी ही मदद कर सकते हैं। (7.आराफ आ0 197)
कहो अल्लाह के सिवा जिनको पुकारते हो पुकारकर देखो। न तकलीफ़ दूर कर सकते हैं न बदलने का अख्तियार है। (17.बनी इसराईल आ0 56)
मेरा मददगार अल्लाह है जिसने यह किताब उतारी और वह नेक लोगों की मदद करता है। (7.आराफ आ0 196)
हम तेरी ही इबादत करते हैं और तुझसे ही मदद मांगते हैं। (1.फातिहा आ0 4)
अल्लाह को मज़बूती से पकड़े रहो वही तुम्हारा मालिक और मददगार हैं। (22.हज आ0 78)
तुम ज़मीन में बच निकलने वाले नही हो और न अल्लाह के सिवा तुम्हारा कोई मददगार है और न हिफाजती। (42.शुरा आ0 31)
आखिर में यही कहूँगा जो अल्लाह ने कुरान में नाजिल किया -
इताअत अल्लाह और उसके रसूल की करो। (3.इमरान आ0 132, 4.निशा आ0 59-69-80, 5.मायदा आ0 92, 8.अनफाल आ0 20, 24.नूर आ0 52-54, 33.अहजाब आ0 71)
पैरवी करो उसकी जो नाजिल किया गया है तुम्हारी तरफ तुम्हारे रब के पास से। और न पैरबी करो इसके सिवा और औलिया (रफीक) की। कम ही है जो तुम नसीहत कबूल करते हो। (7.आराफ आ0 3)

Beshaq
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