बिस्मिल्लाहिर्रहमानीर्रहीम
अस्सलाम अलैकुम व रहमतुल्लाह बरकातहु
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बिद्अत और बिद्अती
➤ हमारे नबी स0 पर जो दीन नाजिल हुआ और हमारे नबी स0 ने जो दीन हमें बतलाया जो कुरान व हदीस में मौजूद है। उसी को दीन इस्लाम कहा जाता है। नबीस0 के बताने के मुताबिक हम जो भी काम इबादत के तौर पर करते हैं वही फर्ज, वाजिब और सुन्नत है। अब इसी का उल्टा यानी जो हमारे नबी स0 ने हमे नही बतलाया है और हम वह काम इबादत और नेकी के तौर पर दीन इस्लाम समझकर करें तो वही बिदअत होती है। सुन्नत का उल्टा यानी मुतजाद (विलोम) बिदअत होता है। हां जो दीन का काम न हो बल्कि अवामी काम हो जैसे जहाज से हज करने जाना। इसमें सिर्फ हज इबादत है। जो दीन का हिस्सा है लेकिन जहाज़, गाड़ी या पैदल से जाना ये दीन का हिस्सा नही। नेकी और सवाब सिर्फ हज का ही मिलेगा। न ही नबी स0 से इसकी कोई दलील ही है कि पैदल मे ज्यादा नेकी और सवारी से कम नेकी मिलेगी। इसी तरह मस्जिद में पंखे और लाइट का लगाना दीन नही बल्कि मस्जिद और मस्जिद में इबादत दीन है। हां मस्जिद कच्ची हो या पक्की सवाब उतना ही मिलेगा। क्योंकि कच्ची या पक्की करना दीन नही। अगरचे ये सब चीजें दीन को सपोर्ट करने वाली चीजें हैं। इनसे इबादात में सहूलियत मिलती है जिसके करने से इन्शाअल्लाह अज्र जरूर मिलेगा। दीन को पकड़ना लाज़मी है, बाकी इंसान की मरजी पर है ।
☞ राफेअ बिन खदीज रजि0 बयान करते हैं कि नबीस0 मदीना तशरीफ लाये। अहले मदीना खजूरों की पेवन्दकारी किया करते थे। रसू0स0 ने पूछा तुम क्या करते हो? जवाब दिया हम ऐसे ही करते आ रहे हैं। आप स0 ने फरमाया अगर ऐसा न करो तो शायद तुम्हारे लिए बेहतर हो। उन्होने ऐसा करना छोड़ दिया तो पैदावार कम हो गई तो आप स0 से शिकायत की। आप स0 ने फरमाया मै एक इंसान हूं, जब मै तुम्हें दीन के किसी मामले में हुक्म दूं तो उसकी तामील करो। और जब मै अपनी राय से कुछ कहूं तो मै एक इंसान हूं। (सहीह मुस्लिम 6127, मिश्कात 147)
➤ बहुत से जाहिल उल्मा सफाई के तौर पर कहते हैं कि नबी के जमाने में आप नही थे तुम्हारे अब्बू नही थे तो तुम भी बिदअत हो। कहते हैं तुम्हारी बिरयानी और मोटर साइकिल साबित करो। अजीब तरह के उल्मा हैं इन्हे पता ही नही बिदअत किसे कहते हैं। खुद बताओ बिरयानी दीन समझकर खाते हैं गाड़ी दीन समझकर चलाते हैं। ये तो गैर मुस्लिम भी करता हैं। दीन में बिदअत ये है मसलन मुहर्रम में ताजिया बनाना। अलम के साथ जुलूस निकालना। मुसलमान अलम के साथ जुलूश दीन समझकर और नेकी का काम समझकर करता है। यह दीन का हिस्सा समझता है जबकि ये काम नबी स0 ने तालीम नही की है। अब इसको कैसे पता कि ये अच्छा है क्योंकि हर अच्छा काम हमारे नबी स0 ने बतला दिया है। छुपाई नही है। कुछ चीजें ऐसी भी हैं जिसको हम अच्छा समझकर करते हैं पर वह अमल अल्लाह के यहां रद्द हो जाता है क्योंकि हमारे अमल के हिसाब से अच्छा ही होता है लेकिन नबी स0 के तरीके पर नही होता। मसलन अगर कोई चार रकात वाली नमाज पाँच रकात पढ़े तो उसको एक रकात ज्यादा पढ़ने के सवाब के बजाय सारी नमाज़ रद्द हो जायेगी और कोई नेकी और सवाब नही मिलेगा क्योंकि उसने नबी स0 के तरीके से रकात नही पढ़ी। ऐसे हर वक्त की नमाज़ में अजान जरूरी है मगर ईद की नमाज में अजान नबी स0 ने नही करवाई न ही तालीम की। अब हम अच्छा समझकर ईद की अजान नही करा सकते। वैसे भी कोइ्र बात बिना सोचे समझे नही करनी चाहिए। अल्लाह का फरमान है-
जिस बात का तुम्हें इल्म न हो उसके पीछे मत पड़ो। बेशक कान, आँख और दिल सबकी पूछ ताछ होगी। (सू0 17 बनीइसराइल आ0 36)
➤ इसी तरह नबी स0 की तरफ जो बात बतलाई न हो मंसूब करना या झूठ बांधना गुनाह है तो कोइ अमल करना कितना गुनाह होगा। इर्शादे नबबी है -
☞ हजरत अबूहुरैरह रजि0 बयान करते हैं कि रसू0स0 ने फरमाया जो शख्स जान-बूझकर मेरी तरफ झूठी बात मन्सूब करेगा वो अपना ठिकाना दोजख में बना ले। (सहीह मुस्लिम 4)
☞ हजरत अली रजि0 ने खुत्बे के दौरान बयान किया रसू0स0 ने फरमाया मेरी तरफ बात मंसूब न करो, मेरे ऊपर झूठ मत बांधो। जो शख्स मेरे ऊपर झूठ बांधेगा जहन्नम में दाखिल होगा। (सहीह मुस्लिम 2)
☞ हजरत अबूहुरैरह रजि0 बयान करते हैं कि रसू0स0 ने फरमाया इंसान के झूठा होने के लिए इतनी बात काफी है कि वो हर सुनी हुई बात (बिला तहकीक) बयान कर दे। (सहीह मुस्लिम 7, मिश्कात 156)
☞ हजरत उमर बिन खत्ताब रजि0 बयान करते हैं कि इंसान के लिए इतना झूठ ही काफी है कि वो हर सुनी सुनाई बात बयान कर दे। (सहीह मुस्लिम 9)
➤ कुछ लोग यह भी कहते कि मना कहां लिखा है तो अब चलते हैं कुरान और सहीह अहादीस की तरफ की मना कैसे है - सबसे पहले तो यह समझ लें कि हमारा दीन इस्लाम मुकम्मल हो चुका है। जो कयामत तक के लिए यही दीन नाफिज रहेगा क्योंकि अब नबियों और पैगम्बरों की आमद खत्म हो चुकी है। इर्शाद बारी तआला है -
आज मैने तुम्हारे लिए दीन को कामिल कर दिया और तुम्हें अपना अनाम भरपूर कर दिया और तुम्हारे लिए इस्लाम के दीन होने में राजी हो गया। (सू05 माइदह आ0 3)
☞ हज्जतुल विदा में नबी स0 ने खुत्बा दिया था तो उसमें भी पूरा दीन पहुंचा देने की लोगो से गवाही ली थी और कहा था ऐ अल्लाह गवाह रहना। (सहीह मुस्लिम 2950, मिश्कात 2555)
➤ दीन जब मुकम्मल हो चुका हैं तो अब नई चीज की गुंजाइस नही। अगर कोई दीन में नई चीज लाया गोया उसने यह समझा कि दीन मुकम्मल नही हुआ था। नबी स0 ने यह बात नही बतलाई (नउजबिल्लाह)। या यह समझा कि नबी स0 से हमें ज्यादा अच्छे बुरे का पता है। जब कि नबी स0 जितनी भी अच्छाई और बुराई थी सब बता चुके हैं। क़ुरआन में अल्लाह तअला फरमाता है →
ऐ ईमान वालों! अल्लाह और उसके रसूल से आगे न बढ़ो। और अल्लाह से डरते रहो। (सू0 49 अल-हुजरात आ0 1)
और जो अल्लाह और उसके रसूल की नाफरमानी करेगा और उसकी मुक़र्रर की हुई हदों से आगे बढ़ेगा उसे अल्लाह आग में डालेगा जिसमें वो हमेशा रहेगा, और उसके लिए रुसवा कर देने वाली सजा है। (सू0 4 निसा आ0 14)
➤ अब रही बात कि कहां मना किया है तो सहीह अहादीस में मुलाहिजा फरमाएं-
☞ हज़रत आइशा रजि0 कहती हैं कि हुजूर स0अ0 ने फरमाया जो शख्स इस दीन में कोई नई बात पैदा करे जो इसमें नही है वह मरदूद (रद) है। (सहीह बुखारी 2697, सहीह मुस्लिम 4492, सनन अबूदाउद 4606, मिश्कात 140)
☞ हज़रत अरबाज बिन सारया बयान करते हैं रसू0स0 ने फरमाया बिलाशुबा तुममें से जो मेरे बाद जिन्दा रहा वह बहुत एख्तलाफ देखेगा। चुनान्चे उन हालात में मेरी सुन्नत और मेरे खुलफा की सुन्नत अपनाए रखना। खुलफा जो असहाब रशद व हिदायत हैं। सुन्नत को मजबूती से थामना बल्कि दाढ़ों (दातों) से पकड़े रहना नई नई बिदआत व अख्तरात से अपने आप को बचाये रखना। बिलाशुबा हर नया काम बिद्अत है और हर बिद्अत गुमराही हैं। (अबूदाउद 4607, तिर्मिजी 2676, मसनद अहमद 17275, इब्ने माजा 43, मिश्कात 165, दार्मी 96)
☞ हजरत जाबिर बिन अब्दुल्लाह कहते हैं कि रसू0स0 जुमा के खुतबे में फरमाते हम्द सलात के बाद बिला शुबा बेहतरीन हदीस (कलाम) अल्लाह की किताब है और जिन्दगी का बेहतरीन तरीका मुहम्मद स0 का तरीका जिंदगी है और दीन में बदतरीन काम वह हैं जो खुद निकाले गये हों और हर नया निकाला हुआ काम गुमराही है। (सहीह मुस्लिम 2005, मिश्कात 141)
☞ हजरत अब्दुल्लाह इब्ने मसऊद रजि0 बयान करते हैं कि रसू0स0 ने फरमाया तमाम कलामों से बेहतर किताबुल्लाह है और तमाम हिदायतों से बेहतर मुहम्मद स0 की हिदायत है। देखो- नए जारी किये कामों से बचो, क्योंकि ये बिदअत है और हर बिदअत गुमराही है। (इब्ने माजा 46)
☞ अब्दुल्लाह बिन मसऊद रजि0 ने कहा सबसे अच्छी बात किताबुल्लाह है और सबसे अच्छा तरीका मुहम्मद स0 का है। और सबसे बुरी बात दीन में नई बात (बिद्अत) पैदा करना है। (सहीह बुखारी 7277, 6098)
☞ इब्ने अब्बास रजि0 कहते हैं अल्लाह के खौफ और इस्तकामत (अटलता) को लाजिम पकड़ो और इतबाह करो और बिदअत न निकालो। (सनन दार्मी 141)
☞ सय्यदना इब्ने उमर रजि0 से मरवी है कि हर बिद्अत गुमराही है अगरचे लोग इसे नेकी ही समझें। (बैहकी)
☞ सय्यदना हुजैफा बिन यमान रजि0 से मरवी है वह फरमाते है जो इबादत सहाबा इकराम ने नही की उसे तुम मत करो। पहले लोगो ने बाद वालों के लिए किसी नई बात की कोई गुंजाइस बाकी नही रहने दी। पस अल्लाह से डरो अपने से पहले (सहाबा) का रास्ता थामे रहो। (सनन अबूदाउद)
बिदअत के गुनाह और सजा
☞ बिलाल बिन हारिश मजनी बयान करते हैं रसू0स0 ने फरमाया जिसने मेरी किसी ऐसी सुन्नत को ज़िन्दा किया जिसे मेरे बाद तर्क कर दिया गया था तो उसे भी उस पर अमल करने वालों के बराबर सवाब मिलेगा और उनके अजर में कोई कमी नही होगी और जिसने बिदअत जारी की या निकाली जिसे अल्लाह और उसके रसूल पसन्द नही करते तो उसे भी उतना ही गुनाह मिलेगा जितना उस पर अमल करने वालों को मिलेगा और उनके गुनाहों में कोई कमी नही होगी। (तिर्मिजी 2677, इब्ने माजा 209, मिश्कात 168)
☞ रसू0 स0 ने फरमाया मेरी उम्मत के कुछ लोगों को (आखिरत में) लाया जायेगा और उन्हे बायें रास्ते की तरफ डाल दिया जायेगा। मै (स0) कहूंगा मेरे रब यह मेरे साथी हैं। अल्लाह फरमाएगा तू नही जानता इन्होने तेरे बाद दीन में क्या क्या बिद्आत ईजाद की। यह सुनकर मै कहूंगाः फिटकार फिटकार इन लोगो के लिए जिन्होने मेरे बाद मेरा तरीका बदल डाला। ((सहीह बुखारी 6582 से 6587 तक, सहीह मुस्लिम 5978, 5996, मिश्कात)
☞ हजरत अली रजि0 कहते हैं मैने रसू0स0 फरमाते हुए सुना है कि अल्लाह की लानत हो उस पर जिसने बिद्अती को पनाह दी। (सहीह मुस्लिम 5125)
☞ हजरत हुजैफा रजि0 कहते हैं कि रसू0स0 ने फरमाया कि बिद्अती का रोजा, नमाज ,जकात, उमरा, जिहाद, सदका, फिदया कुछ भी अल्लाह तआला कबूल नही करता बल्कि वह इस्लाम से ऐसा बाहर हो जाता है जैसे आटे से बाल निकाल लिया जाय। (इब्ने माजा 49)
☞ हजरत अब्दुल्लाह इब्ने अब्बास रजि0 कहते हैं रसू0स0 ने फरमाया अल्लाह तआला बिदअती के आमाल की कुबूलियत से इन्कार फर्माता है, यहां तक कि वह बिदअत को छोड़ दे। (इब्ने माजा 50, अस्सुन्नह 39)
☞ गुजैफ बिन हारिश समाली रजि0 बयान करते हैं कि रसू0स0 ने फरमाया जब कोई कौम बिदअत ईजाद करती है तो उसी की मिश्ल उससे सुन्नत उठा ली जाती है। पस सुन्नत पर अमल करना बिदअत ईजाद करने से बेहतर है। (मसनद अहमद 17095, मिश्कात 187)
☞ हज़रत हसान रह0 (ये ताबईन हैं) कहते हैं- जो कौम अपने दीन में बिदअत जारी करती है उसमें से इसी कदर अल्लाह तआला सुन्नत निकाल लेता है। फिर उस को क़यामत तक नही लौटाता। (सनन दार्मी 99)
☞ हज़रत अबू कलाबा रजि0 कहते हैं जिसने कोई बिदअत निकाली उस पर तलवार निकालना जायज हो जाता है। (सनन दार्मी 100)
☞ सय्यदना हसन रजि0 से मन्कूल है कि अल्लाह तआला बिद्अती की नमाज रोजा हज और उमरा कबूल नही फरमाता यहां तक कि वह बिद्अत को छोड़ न दे। (अल आमर्बालातिबा)
☞ हज़रत हुजैफा रजि0 ने कहा कि ऐ कुरआन व हदीस पढ़ने वालों! तुम अगर कुरआन व हदीस पर न जमोगे, इधर उधर दाएं बाएं रास्ते पकड़ोगे तो गुमराह होओगे, बहुत ही बड़े गुमराह। (सहीह बुखारी 7282)
बिदअत की किस्में
➤ कुरान और सहीह अहादीस की रू से सारी दीन में नई बात बिदअत ही है इसमें कोई किस्म नही है। हदीस में कुछ ऐसे वाकियात मौजूद हैं जिसके मद्देनजर अहले इल्म ने बिदअत की दो किस्में बताई है। एक बिदअते हसना और दूसरा बिदअते सय्या है।
बिदअते हसना- कोई ऐसा काम जो नबी स0 ने तालीम न की हो और न किया हो लेकिन अगर वह काम न किया जाय जिससे उस दीन का नुकसान हो रहा हो जो नबी स0 पर नाजिल हुई है या नबी स0 की सुन्नत का फायदा हो रहा हो। उसको बिदअते हसना कहते हैं। मसलन क़ुरआन का किताबी शकल में तरतीब होना और जुमा की दो अजाने। इसकी जरूरत क्यों पड़ी इसे हदीस पढ़कर समझें।
☞ हज़रत जैद बिन साबित रजि0 ने बयान किया कि जंगे यमामा में (सहाबा की बहुत बड़ी तादाद) शहीद हो जाने के बाद हज़रत अबूबक्र रजि0 ने मुझे बुलवाया। हज़रत उमर रजि0 भी मौजूद थे। उन्होने कहा कि यमामा की जंग में बहुत बड़ी तादाद में क़ुरआन के कारियों की शहादत हो गई है और मुझे डर है कि उसी तरह कुफ्फार के साथ दूसरी जंगों में भी हाफिजे कुरान बड़ी तादाद में कत्ल हो जाएंगे और यूँ क़ुरआन के जानने वालों की बड़ी तादाद खत्म हो जायेगी। इसलिए मेरा ख्याल है कि आप क़ुरआन मजीद को (किताबी शक्ल में) जमा करने का हुक्म दे दें। मैने हज़रत उमर रजि0 से कहा कि आप एक ऐसा काम किस तरह करेंगे जो रसू0स0 ने नही किया? हजरत उमर ने जवाब दिया कि अल्लाह की कसम ये खैर का काम है। हज़रत उमर यह बात मुझसे बार बार कहते रहे। आखिर अल्लाह तआला ने इस मसले में मेरा भी सीना खोल दिया और मेरी भी वही राय हो गई जो हज़रत उमर की थी।
हज़रत जैद रजि0 बयान करते हैं हज़रत अबूबक्र रजि0 ने मुझसे कहा कि आप जवान और अक्लमंद हैं और आप पर किसी किस्म का कोई इल्जाम नही। आप रसू0स0 की वह्यी भी लिखते थे, इसलिए आप क़ुरआन को पूरी तलाश और मेहनत के साथ एक जगह जमा कर दें। अल्लाह की कसम! अगर ये लोग मुझे किसी पहाड़ को भी उसकी जगह से दूसरी जगह हटाने के लिए कहते तो मेरे लिए यह काम भी उतना मुश्किल नही था जितना कि उनका ये हुक्म कि मैं क़ुरआन को जमा कर दूँ। मैने कहा कि आप लोग एक ऐसे काम को करने की हिम्मत कैसे करते हैं जो रसू0 स0 ने खुद नही किया था। हज़रत अबूबक्र रजि0 ने कहा अल्लाह की कसम! ये एक अमले खैर है। हज़रत अबूबक्र रजि0 ने ये जुमला बराबर दोहराते रहे, यहां तक कि अल्लाह तआला ने मेरा भी हज़रत अबूबक्र रजि0 और हज़रत उमर रजि0 की तरह सीना खोल दिया। हदीस आगे और है.... । (सहीह बुखारी 4986, मिश्कात 2220)
➤ ऊपर दी गई हदीस से वाजेह हो गया कि कितना जरूरी हो गया था कि कुरान को एक किताबी शक्ल में जमा कर दिया जाना लेकिन फिर भी हज़रत जैद रजि0 को यह काम नबी स0 के तरीके के खिलाफ लग रहा था। पर ये काम न किया गया होता तो शायद यह कुरान हम तक न पहुंच पाता। अब दूसरी राह जो जुमा की अजान है उससे पता चलेगा।
☞ साइब बिन यजीद रजि0 बयान करते हैं कि रसू0स0 और अबूबक्र व उमर रजि0 के दौर में जुमा के रोज़ जब इमाम मिम्बर पर बैठ जाता तब पहली अजान कही जाती थी। पस जब हज़रत उस्मान रजि0 का दौर आया और मुसलमान ज्यादा हो गये तो उन्होने मुकामे जौरा पर एक और अजान दिलवाने लगे। बाद में यही दस्तूर कायम रहा। अबूअब्दुल्लाह इमाम बुखारी रह0 फरमाते हैं कि जौरा मदीना के बाजार में एक जगह है। (सहीह बुखारी 912, 916, मिश्कात 1404)
➤ इस हदीस से यह मालूम होता है कि जुमा की नमाज़ में दूरदराज के लोग इकट्ठा होते है और वक्ते जुमा न मालूम होने से दूर के लोग वक्त पर नही पहुंच पाते। इसलिए बाजार में एक अजान और शुरू की ताकि दूर के लोग भी वक्त पर आ जाएं। इन दोनों हदीसों से साफ पता चलता है यह बिदअत उसी दीन के लिए जारी किया गया जो हमारे नबी स0 ने तालीम की है। अगर यह काम न किया गया होता तो यकीनन दीन का बहुत बडा नुकसान होता।
➤ सहाबएकिराम का कोई अमल बिदअत सुमार नही किया जायेगा क्योंकि नबी स0 ने खुलफाए राशदीन और सहाबा का तरीका पकड़ने का हुक्म दिया है।
☞ हज़रत जरीर बिन अब्दुल्लाह रजि0 बयान करते हैं, रसू0स0 के पास कुछ गरीब लोग आये तो आप स0 ने असहाब को सदका वगैरह के लिए उभारा। लोग सदका देने में ताखीर किये तो आप स0 का चेहरा मुबारक मुरझा गया। फिर एक उठा सदका लाया, दूसरा भी उठा लाया और देखते देखते ढेरों सदका का ढेर लग गया। आप स0 का चेहरा मुबारक चमक उठा और फरमाया जिसने इस्लाम के अन्दर अच्छा तरीका जारी किया और उसके बाद उस पर अमल किया गया उसके लिए उस पर अमल करने वालों के बराबर सवाब लिखा जायेगा और दूसरों के अज्र व सवाब में कोई कमी नही होगी और जिसने इस्लाम में गलत तरीका जारी किया और उसके बाद उस पर अमल किया गया तो उस पर, उस अमल करने वालों के बराबर गुनाह रखा जायेगा और उन दूसरों के गुनाह के बोझ में कोई कमी नही होगी। (सहीह मुस्लिम 6800)
➤ अच्छा तरीका जारी करने से मुराद दीन ही को सहूलियत देना है मसलन गरीबों की मदद करना, बीमारों को इलाज और तालीम के लिए स्कूल का इंतजाम, पानी का इंतज़ाम करना, मस्जिद में नल लाइट और पंखे लगवाना वगैरह।
बिदअते सय्या- इस बिदअत को ऐसे काम करने को कहते है जो कुरान व हदीस से साबित न हो और अवाम उसे दीन समझकर करते हो और सुन्नत के खिलाफ हो। भले ही वह काम करने में अच्छा और नेकी का लगता हो। हर वह काम जो नबी स0 ने तालीम न की हो न ही किया हो। या नबी स0 ने बतलाया हो लेकिन हमारे अमल करने का तरीका नबी स0 या सहाबा रजि0 के तरीके से अलग हो। मसलन इस हदीस से वाजेह है -
☞ हज़रत अब्दुल्लाह बिन मसूद रजि0, हज़रत अबूमूसा असअरी रजि0 और हज़रत अबू अब्दुर्रहमान रजि0 साथ थे। अबूमूसा रजि0 ने कहा ऐ! अबू अब्दुर्रहमान! मैने मस्जिद में अभी एक काम देखा है वह मुझे बुरा मालूम हुआ है और अल्लाह का शुक्र है कि मैने बेहतर ही देखा है। अब्दुल्लाह बिन मसूद ने कहा- वह क्या है? अबूमूसा रजि0 ने कहा- मैने एक जमात को हलकों (गिरोह) की शकल में मस्जिद में बैठे हुए देखा। हर हलका में एक आदमी है और उनके हाथों में कंकरियां हैं वह कहता है- सौ बार अल्लाहु अकबर पढ़ो तो वह सौ बार अल्लाहु अकबर पढते हैं। फिर वह कहता है- सौ बार ला इलाहा इल्लल्लाहो पढ़ो तो वह सौ बार ला इलाहा इल्लल्लाहो पढते हैं। फिर वह कहता है- सौ बार सुबहानअल्लाह कहो तो वह सौ बार सुबहानअल्लाह कहते हैं। अब्दुल्लाह बिन मसूद रजि0 ने कहा- फिर तूने उनसे क्या कहा? अबूमूसा ने कहा मैने आप की राय का इंतजार किया उनसे कुछ नही कहा। हत्ता कि आप उन हलकों में से एक के पास आकर खड़े हो गये और फरमाया यह क्या है जो मै तुम्हें करते हुए देख रहा हूं। उसने कहा- ऐ अबू अब्दुल्लाह! हम इन कंकरियों के साथ अल्लाहुअकबर, लाइलाहाइल्लल्लाह और सुबहानअल्लाह को सुमार करते हैं। उन्होंने फरमाया- ऐ मुहम्मद स0 की उम्मत! तुम पर अफसोस है कि तुम कितनी जल्दी हलाक हो रहे हो जबकि नबी स0 के सहाबा कसरत से मौजूद हैं और आप स0 के कपड़े अभी बोसीदा (गंदे) नही हुए और न बरतन टूटे। मुझे उस जात की कसम! जिसके हाथ में मेरी जान है। या तो तुम ऐसे तरीके पर हो जिस में रसू0स0 के तरीके से ज्यादा हिदायत है या तुमने गुमराही का दरवाज़ा खोला हुआ है। उसने कहा- ऐ अब्दुर्रहमान! अल्लाह की कसम! हमने तो सिर्फ भलाई का इरादा किया था। उन्होने कहा बहुत से लोग नेकी का इरादा करते हैं मगर उन्हें नेकी हासिल नही होती। रसू0स0 ने हमसे फरमाया- एक कौम क़ुरआन पढ़ेगी जो इनके हलकों से नीचे नही उतरेगा। और अल्लाह की कसम! मैं नहीं जानता शायद कि अक्सर तुम से ही हों। फिर आप उनके पास से वापस आ गये। बाद में वही हलकों के तमाम लोग नहरवान के दिन खारजियों के साथ मिलकर मुसलमानों से जंग कर रहे थे। (सनन दार्मी 210)
➤ आखिर में यही कहूंगा कि ये सब कमियां हमारी लाइल्मी की वजह से होती है। अब कोई जान बूझकर इल्म पर तवज्जो न दे तो फरमाने नबी स0 है -
☞ हज़रत अनस बिन मालिक रजि0 कहते हैं रसू0स0 ने फरमाया हर मुसलमान पर इल्म हासिल करना जरूरी है, लेकिन जो इल्म की सलाहियत न रखता हो और इल्म का अहल न हो उसको इल्म सिखाना ऐसा है जैसे सुअर के गले में सोने और मोती जवाहरात का हार डालना। (इब्ने माजा 224)
☞ हज़रत अब्दुल्लाह बिन अम्र बिन अल आस रजि0 से नकल किया कि मैने रसू0स0 से सुना, आप स0 फर्माते थे कि अल्लाह इल्म को इस तरह से नही उठा लेगा कि उसको बंदों से छीन ले। बल्कि वो हक उलमाओं को मौत देकर इल्म को उठाएगा। यहां तक कि जब कोई आलिम बाकी नही रहेगा तो लोग जाहिलों को सरदार बना लेंगे, उनसे सवालात किये जाएंगे और वो बगैर इल्म के जवाब देंगे। (यानी ये लोग अपनी जहालत से फत्वा देंगे) इसलिए खुद भी गुमराह होगें और लोगों को भी गुमराह करेगे। (सहीह बुखारी 100, 7307, इब्ने माजा 52)
मोबाइल नं0- 9935873527
