नमाज़ की अहमियत
बिस्मिल्लाहिर्रहमानीर्रहीम
अस्सलाम अलैकुम व रहमतुल्लाह बरकातहु
इर्शादे बारी तआला है -
बेशक नमाज़ मोमिनों पर मुकर्रर वक़्तों पर फर्ज़ है। (सू04 बकरा आ0 103)
और नमाज़ कायम रखो और जकात दो और रुकू करने वालों के साथ रुकू करो। (सू02 बकरा आ0 43)
नमाज़ कायम करें बिला शुब्हा नमाज़ बेहयाई और बुराई से रोकती है। (सू029 अनकबूत आ0 45)
नमाज़ों की हिफाजत करो। (सू02 बकरा आ0 238)
अल्लाह की तरफ रुजू होकर उससे डरते रहो और नमाज़ काइम रखो और मुश्रिकों में से न हो जाओ। (सू030 रोम आ0 31)
सय्यदना अबू सईद रजि0 रिवायत करते हैं कि रसू0स0 ने फरमाया, जब तुम किसी ऐसे आदमी जो मस्जिद में आता जाता हो तो उसके लिए ईमान की गवाही दो क्योंकि अल्लाह तआला फरमाते हैं- ‘‘अल्लाह की मस्जिदें तो वही आबाद करता है जो अल्लाह और आखिरत के दिन पर ईमान लाए, नमाज कायम करें और जकात अदा करें।’’ सूरह 9 तौबा आ0 18 (तिर्मिजी 2617, 3093, इब्ने माजा 802)
हज़रत अनस बिन मालिक रजि0 से रिवायत है कि आप स0 ने फरमाया अल्लाह के घरों को अल्लाह वाले ही आबाद करते हैं। (बैहकी 4989)
हज़रत अनस बिन मालिक रजि0 से रिवायत है कि आप स0 ने फरमाया अंधेरी रातों में मस्जिद की तरफ चलकर आने वालों के लिए कयामत के दिन मुकम्मल नूर की खुशखबरी है। (इब्ने माजह 781, बैहकी 4976)
हज़रत अली रजि0 कहते हैं कि आप स0 ने फरमाया बाकी आमाल बराबर हैं। और हज़रत उमर बिन खत्ताब से रिवायत है कि वह ख्याल करते थे कि इस्लाम में उसका कोई हिस्सा नही जिसने नमाज़ तर्क की और अली रजि0 से रिवायत है कि जिसने नमाज़ न पढ़ी वह काफिर हुआ और अब्दुल्लाह बिन मसऊद रजि0 कहते हैं कि जिसने नमाज़ न पढ़ी उसका कोई दीन नही। (बैहकी 6499)
हज़रत अनस रजि0 से रिवायत है कि रसू0स0 ने फरमाया मेरी आँखों की ठंडक नमाज़ में है। (निसाई 3391)
हजरत इब्ने उमर रजि0 से मरवी है कि नबी स0 ने फरमाया जिस शख्स की नमाज़ असर फौत हो जाय, गोया उसके अहलखाना और माल तबाह व बरबाद हो गया। (सहीह बुखारी 552, सहीह मुस्लिम 1417, अबूदाउद 414, मसनद अहमद 4545)
हज़रत अब्दुल्लाह बिन शकीक उकैली रह0 फरमाते हैं मुहम्मद स0 के सहाबा रजि0 नमाज के अलावा किसी अमल के छोड़ने को कुफ्र खयाल नहीं करते थे। (तिर्मिजी 2622 - मिश्क़ात 579)
रसू0स0 ने फरमाया- दीन का सिरा इस्लाम है और इसके सुतून नमाज़ है। (तिर्मिजी 2616)
हज़रत अबूहुरैरह रजि0 से रिवायत है कि रसू0स0 ने फरमाया अगर मालूम हो जाय कि इशा और फजर की कितनी फजीलतें हैं तो अगर घुटनों के बल आना पड़ता तो फिर भी आते। (सहीह बुखारी 615, 657, 721, 2689)
रसू0स0 ने फरमाया जब बच्चा सात साल का हो तो उसे नमाज़ का हुक्म दो, अगर दस बरस का हो जाये (नमाज़ में सुस्ती करे) तो उसे सजा दो। (अबूदाउद 494)
हज़रत जाबिर इब्ने अब्दुल्लाह रजि0 का बयान है कि रसू0स0 ने फरमाया मुसलमान और काफिर के दर्मियान में नमाज़ से फर्क होता है। (अबूदाउद 4678, इब्ने माजा 1078, निसाई 465)
हज़रत जाबिर रजि0 से रिवायत है कि मैने रसू0स0 को फरमाते सुना, इंसान को शिर्क व कुफ्र से जोड़ने वाली चीज नमाज़ छोड़ना है। (सहीह मुस्लिम 246, 247, तिर्मिजी 2618 मिश्क़ात 569)
हज़रत अब्दुल्लाह इब्ने जुबैर रजि0 कहते हैं कि रसू0स0 ने फरमाया मेरे और उन लोगों के दर्मियान नमाज का अहद है। जिस शख्स ने नमाज़ को तर्क किया उसने कुफ्र किया।(तिर्मिजी 2621, इब्ने माजा 1079, निसाई 464)
हज़रत अनस इब्ने मालिक रजि0 कहते हैं कि रसू0स0 ने फरमाया शिर्क और इस्लाम में सिर्फ नमाज़ का फर्क है, लिहाजा जिस शख्स ने नमाज़ को छोड़ दिया उसने शिर्क किया।(इब्ने माजा 1079)
अमीरुलमोमनीन हजरत उमर फारूक रजि0 जब जख्मी थे, उन्होने नमाज अदा की और फरमाया जो शख्स नमाज़ नही पढ़ता उसका इस्लाम से कोई ताल्लुक नही। (मोत्ता इमाम मालिक)
आप स0 का फरमान है जिस शख्स ने उम्दा तरीके से वजू किया बरवक्त इनकी अदायगी की और इनके रूकूअ व सज्दा और खुशूअ को मुकम्मल तौर पर बजा लाया तो उसके हक में अल्लाह का वादा और जिम्मा है कि वह उसे बख्श देगा। और जिसने बजावरी न की तो उसके बारे में अल्लाह का कोई जिम्मा नही, चाहे तो उसे बख्श दे या चाहे उसे अजाब दे। (अबूदाउद 425)
हज़रत अब्दुल्लाह बिन मसऊद रजि0 बयान करते हैं कि मैने सहाबाकिराम रजि0 को देखा कि नमाज़ से किसी ऐसे शख्स के सिवा कोई पीछे न रहता जो मुनाफिक होता था और उसके निफाक का सबको पता था या बीमार होता था। ऐसा बीमार भी नमाज़ के लिए आता था जो दो आदमियों के सहारे चल सकता था। रसू0स0 ने हमें हिदायत के तरीकों में से ये भी है कि नमाज ऐसी मस्जिद में आकर पढ़ी जाये जिसमें अजान दी जाती है। (सहीह मुस्लिम 1487)
हजरत अब्दुल्लाह बिन मसऊद रजि0 ने फरमाया जिस इंसान को ये बात पसन्द हो कि कल कयामत के दिन उसकी अल्लाह से मुलाकात मुसलमान होने की सूरत में हो तो वह नमाज़ की पाबंदी उस जगह पर करे जहां उनके लिए बुलावा यानी अजान सुने और नमाज़ बाजमात अदा करें, क्योंकि अल्लाह तआला ने तुम्हारे नबी के लिए हिदायत के तरीके मुकर्रर कर दिये हैं और नमाज़ों का एहतिमाम हिदायत के तरीकों में से है। यानी हिदायत का राहे अमल यही है और अगर तुम नमाज घरों में पढ़ोगे जैसाकि ये जमात से पीछे रहने वाला अपने घर में पढ़ता है तो तुम अपने नबी की राह छोड़ दोगे और अगर तुम अपने नबी के रास्ते को छोड़ दोगे तो गुमराह हो जाओगे। जो आदमी भी पाकीजगी हासिल करता है फिर उन मस्जिदों में से किसी मस्जिद का रुख करता है तो अल्लाह उसके हर कदम के बदले एक नेकी लिखता है और एक दर्जा बुलन्द फरमाता है और उसका एक गुनाह मिटा देता है और मैने अपने साथियों को पाया कि हममें से कोई एक भी जमआत से पीछे न रहता था सिवाए ऐसे मुनाफिक के जिसका निफाक सबको मालूम था। एक आदमी को दो आदमियों के सहारे लाकर सफ में खड़ा किया जाता था। (सहीह मुस्लिम 1488, अबूदाउद 550,)
हज़रत इब्ने मसऊद रजि0 कहते हैं कि एक शख्स ने किसी गैर औरत को बोसा लिया और नबी स0 की खिदमत आकर इस हरकत को बताया। इस पर यह आयत नाजिल हुई कि नमाज दिन के दोनों हिस्सों में कायम करो और कुछ रात गये भी। बिला शुब्हा नेकियां बुराइयों को मिटा देती हैं। उस शख्स ने कहा कि या रसू0स0 क्या ये सिर्फ मेरे लिए है तो आप स0 ने फरमाया कि नही बल्कि मेरी तमाम उम्मत के लिए यही हुक्म है। (सहीह बुखारी 526, 4687)
हजरत अबूहुरैरह रजि0 से रिवायत है कि नबी स0 ने फरमाया उस जात की कसम! जिसके कब्जे में मेरी जान है मैने इरादा कर लिया था कि लकड़ियों के जमा करने का हुक्म दूं फिर नमाज़ के लिए कहूं, उसके लिए अजान दी जाय फिर किसी शख्स से कहूं कि वो इमामत करे और मै उन लोगों की तरफ जाऊं (जो जमात में शरीक नही होते) फिर उन्हें उनके घरों समेत जला दूं। उस जात की कसम! जिसके हाथ में मेरी जान है अगर ये जमात में न शरीक होने वाले लोग इतनी बात जान लें कि उन्हें मस्जिद में एक अच्छे किस्म की गोस्त वाली हड्डी मिल जाएगी या दो अच्छे खुर ही मिल जाएगें तो ये इशा की जमात के लिए मस्जिद में जरूर जरूर हाजिर हो जाएं। (सहीह बुखारी 644, 657, 7224 सहीह मुस्लिम 1481, अबूदाउद 548, इब्ने माजा 791, बैहकी 4930)
हजरत अब्दुल्लाह इब्ने उम्मे मक्तूम रजि0 का बयान है कि एक दिन मैने रसू0स0 से अर्ज किया या रसू0स0 मैं जईफ बूढ़ा और नाबीना आदमी हूं। कोई शख्स ऐसा नही जो मुझको मस्जिद तक पहुंचाया करे। इस वजह से अगर आपकी इजाजत हो तो अपने मकान में ही नमाज़ पढ़ लिया करूं? हुजूर स0 ने फरमाया बताओ अजान की आवाज तुम्हारे कानों तक आती है या नही? मैने अर्ज किया जी हां आती है। आप स0 ने फरमाया बस तो तुम्हारे लिए मकान में नमाज़ पढ़ने की इजाजत नही। (सहीह मुस्लिम 1486, अबूदाउद 552, इब्ने माजा 792, बैहकी 4946)
हज़रत अबूहुरैरह रजि0 से मरवी है कि रसू0स0 ने पूछा मुझे बताओ अगर तुममे से किसी के घर के सामने नहर बह रही हो और वह रोजाना उसमें पाँच मर्तबा नहाए तो क्या उसके बदन पर मैल कुचैल बाकी रह जाएगा? सहाबए किराम ने जवाब दिया, नही। आप स0 ने फरमाया पाँच नमाजों की मिसाल ऐसे ही है। अल्लाह तआला उनकी वजह से खताओं को मिटा देता है। (सहीह बुखारी 528 सहीह मुस्लिम 1522, तिर्मिजी 2868 निसाई 463, बैहकी 4971)
हज़रत अबूहुरैरह रजि0 ने बयान किया कि मैने रसू0स0 को फरमाते हुए सुना- कयामत में सबसे पहले बन्दे से नमाज़ का हिसाब लिया जाएगा। अगर वह दुरुस्त हुई तो वह कामयाब और कामरान हो गया और अगर वह खराब हुई तो वह नाकाम रहा और खसारे (घाटे) में गया। (तिर्मिजी 413, निसाई 466)
हज़रत यहया बिन साद रजि0 से रिवायत है कि क़यामत के दिन पहले नमाज देखी जायेगी अगर नमाज़ कबूल हो गयी तो फिर और अमल उसके देखे जायेगे वरना कोई अमल न देखा जायेगा। (मोत्ता इमाम मालिक 415)
हज़रत अबू सईद खुदरी और हज़रत अबू हुरैरह रजि0 से रिवायत है कि रसू0स0 ने फरमाया- बाजमआत नमाज़ पढ़ना तुम्हारे अकेले नमाज़ पढ़ने से पच्चीस गुना अफजल है। (सहीह बुखारी 646, 4717, सहीह मुस्लिम 1472, अबूदाउद 560, तिर्मिजी 216)
हज़रत अब्दुल्लाह बिन उमर रजि0 से रिवायत है कि रसू0स0 ने फरमाया- बाजमआत नमाज अदा करना अकेले नमाज़ पढ़ने से सत्ताइस गुना अफजल है। (सहीह बुखारी 645, 649, सहीह मुस्लिम 1477, इब्ने माजा 789)
हज़रत अली रजि0 का बयान है कि रसू0स0 की आखिरी बात यही थी- नमाज़! नमाज़ और अपने गुलामों के बारे में अल्लाह से डरते रहना। (अबूदाउद 5156)
रसू0स0 को जब कोई गम लाहिक होता तो नमाज पढ़ने लगते थे। (अबूदाउद 1319)
हज़रत अबूदर्दा रजि0 बयान करते हैं नबी स0 ने मुझे वसीयत फरमाई कि अल्लाह के साथ किसी को शरीक न बनाना ख्वाह तुम्हें टुकड़े टुकड़े कर दिया जाये कर दिया जाये और ख्वाह तुम्हें जला दिया जाये और जान बूझकर फर्ज नमाज़ तर्क न करना। जिसने अमदन इसे तर्क कर दिया तो उससे अल्लाह का जिम्मा उठ गया और शराब न पीना क्योंकि वह तमाम बुराइयों की चाभी है। (इब्ने माजा 4034, मिश्कात 580)
हज़रत अब्दुल्लाह रजि0 बयान करते हैं मैने रसू0स0 से पूछा सबसे बेहतरीन अमल कौन सा है? आप स0 ने फरमाया अव्वल वक्त में नमाज़ पढ़ना। मैने पूछा फिर कौन? आप स0 ने फरमाया जिहाद फी सबीलिल्लाह। मेने पूछा फिर कौन? आप स0 ने फरमाया माँ बाप के साथ हुस्न सुलूक करना। (हाकिम 674)
हज़रत इब्ने उमर रजि0 बयान करते हैं कि रसू0स0 ने इर्शाद फरमाया सबसे बेहतरीन अमन अव्वल वक्त में नमाज़ पढ़ना है। (हाकिम 678)
सय्यदना उसमान बिन अफान रजि0 से रिवायत है कि आप स0 ने फरमाया जिस शख्स ने जान लिया कि नमाज़ हक है, वाजिब है या फर्ज है तो वह जन्नत में दाखिल होगा। (बैहकी 1676)
हज़रत अबूदरदा रजि0 फरमाते हैं कि मैने रसू0स0 ने फरमाया जिस बस्ती या देहात में तीन आदमी हों और नमाज़ कायम न की जाती हो उस जगह शैतान का गलबा होता है। तुम जमात को लाजिम पकड़ो क्योंकि भेड़िया दूर रहने वाली (बकरी) को खा जाता है। (बैहकी 4929)
हज़रत अली रजि0 फरमाते हैं- मस्जिद के हमसायों में से जो अजान को सुनता है और वह तंदुरुस्त है उसे कोई अजर नहीं फिर भी नमाज़ के लिए नही आता तो उसकी कोई नमाज़ नहीं। (बैहकी 4944)
हज़रत अब्दुल्लाह बिन अम्र रजि0 से रिवायत करते है कि रसू0स0 ने एक रोज़ नमाज़ का ज़िक्र करते हुये फ़रमाया जिस ने नमाज़ की हिफाज़त व पाबंदी की तो वह इस शख्स के लिए रोज़े क़यामत नूर, दलील और निजात होगी, और जिसने उसकी हिफाज़त व पाबंदी न की तो रोज़े क़यामत उसके लिए नूर, दलील और निजात नहीं होगी और वह क़ारून, फिरऔन, हामान और अबी बिन खल्फ के साथ होगा। (मुसनद अहमद 6576 - दार्मी 2724 - मिश्क़ात 578 - बैहक़ी 2823)
रसू0स0 ने फरमाया तुम उसी तरह नमाज़ पढ़ना जैसे मुझे पढ़ते देखा है। (सहीह बुखारी 631)
अल्लाह हम सब लोगों को नमाज़ पढ़ने और ईमान की हालत में जिंदगी बसर करने की तौफ़ीक़ दे। आमीन !
