बिस्मिल्लाहिर्रहमानीर्रहीम
अस्सलाम अलैकुम व रहमतुल्लाह बरकातहु
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गमें हुसैन रजि0
➤ बिरादराने इस्लाम आज चन्द मामलात गमें हुसैन रजि0 के मुताल्लिक मसला कुरान और सहीह अहादीस की रोशनी में हल करेगे। इन्शाअल्लाह!
➤ सोग और गम हकीकतन मनाई नही जाती बल्कि खुद ब खुद हो जाता है। वह भी सिर्फ उसी के लिए जिससे मोहब्बत होती है। ज्यादा गम होने पर फितरतन हर शख्स को आँसू भी आ ही जाते हैं। जैसा कि अहादीस में आया है-
☞ रसू0स0 की साहेबजादी जैनब रजि0 का एक लड़का मौत के बिल्कुल करीब था। रसू0स0 के सामने लाया गया। देखकर रसू0स0 के आँख से आँसू बहने लगे तो हजरत सअद रजि0 ने कहा या रसू0स0 ये रोना कैसा? आप स0 ने फरमाया कि ये तो अल्लाह की रहमत है कि जिसे अल्लाह ने अपने नेक बन्दों के दिलों में रखा है। (सहीह बुखारी 1284 5655, अबूदाउद 3125)
☞ नबी स0 की बेटी उम्मे कुलसूम रजि0 (ह0 उस्मान गनी रजि0 की बीबी) तदफीन के वक्त कब्र पर बैठे थे और आँखों में आँसू भरे हुए थे। (सहीह बुखारी 1285, 1342)
☞ ह0 अबूहुरैरह रजि0 बयान करते हैं कि रसू0स0 एक जनाजे में शरीक हुए। ह0 उमर रजि0 ने एक औरत को रोते देखा। आप उसको डांटने लगे तो रसू0स0 ने फरमाया उमर! रहने दो ये मुसीबत का वक्त है, जख्म ताजा है, सब्र करना मुश्किल है। (इब्ने माजा 1587, नसाई 1860)
☞ नबी स0 के साहेबजादे इब्राहीम जब दम तोड़ रहे थे तो आप स0 रो पड़े तो हजरत अब्दुर्ररहमान बिन औफ बोल पड़े कि या रसू0स0 आप भी बेसब्री करने लगे। आप स0 ने फरमाया ये बेसब्री नही ये तो रहमत है। फिर रोते हुए फरमाया आँख से आँसू जारी है और दिल गम से निढाल है पर यही कहेंगे वही जो परवरदिगार को पसन्द है और ऐ इब्राहीम! हम तुम्हारी जुदाई से गमगीन हैं। (सहीह बुखारी 1303, अबूदाउद 3126)
☞ हजरत आयशा रजि0 बयान करती हैं कि जब हजरत जैद बिन हारिसा, जाफर बिन अबी तालिब और अब्दुल्लाह बिन रवाहा रजि0 की शहादतें हुई तो नबी स0 मस्जिद में बैठ गये। आपके चेहरे पर गम के असरात नुमायां थे। (सहीह बुखारी 1305, अबूदाउद 3122, निसाई 1848)
☞ हजरत अनस रजि0 से रिवायत है कि रसू0स0 फौत हुए तो हज़रत फ़ातिमा रजि0 रोने लगी। साथ में हाय मेरे अब्बाजान कह रही थी। (सहीह बुखारी 4462, निसाई 1845)
➤ कुरान में भी आया है सूरह 12 यूसुफ आयत 84 में हजरत याकूब अलै0 का हजरत यूसुफ अलै0 के लिए गम होना और इतना रोना कि उनकी आखें सफेद हो गई। यह तो हर इंसान पर ताजा जख्म होने की वजह से अपने अंदर के जजबात को रोक नही सकता।
➤ कुछ ज़ख्म, कुछ ज़ुल्म, कुछ हादसे ऐसे भी होते है जो ता जिंदगी गम में डुबो देती है। वही ग़म हज़रत हुसैन रजि0 का है। वह भी ऐसी जालिमाना शहादत कि सोचकर भी रूह कांप जाये। एक अकेले को चारों तरफ से तीर की बारिश की जाये और गश खाकर घोड़े से जमीन पर सच्दे में गिर जाये। फिर भी बदबख्तों का जी न भरे और तलवारें चलाकर सरे मुबारक काटकर नेजे पर घुमाएं। फिर किस मोमिन का दिल न रोयेगा। अल्लाह की लानत ऐसे जालिमों पर जिसने हुसैन रजि0 के साथ ऐसा किया। अल्लाह कुरान में फरमाता है- बेशक जो लोग अल्लाह और उसके रसूल को ईजा (तकलीफ) देते हैं अल्लाह की लानत है उस पर दुनिया और आखिरत में। और रुसवाई वाला अजाब तैयार किया है। (सू0 33 अहजाब आ0 57)
➤ यह शायद पहली शख्सियत होगी जिसके गम में नबी स0 शहादत के पहले ही गम होकर रोते थे।
☞ अब्दुल्लाह बिन नजी के वालिद एक मर्तबा हज़रत अली रजि0 के साथ जा रहे थे। उनके ज़िम्मे हज़रत अली के वजू की खिदमत थी। जब वह सिफीन की तरफ जाते हुए नैनवी के करीब पहुंचे तो हजरत अली रजि0 ने पुकार कर फरमाया अबू अब्दुल्लाह! फरात के किनारे पर रुक जाओ। मैने पूछा कि खैरियत है? फरमाया मै एक दिन नबी स0 की खिदमत में हाज़िर हुआ तो आप स0 की आंखों से आसुओं की बारिश हो रही थी, (हुसैन रजि0 आप की गोद में थे) मैने अर्ज किया या रसू0स0! क्या किसी ने आप को गुस्सा दिलाया है, खैर तो है कि आप के आंखों से आँसू बह रह रहे हैं? फरमाया ऐसी कोई बात नही है बल्कि बात ये है कि अभी थोड़ी देर पहले मेरे पास से जिब्राईल उठकर गये हैं। वह कह रहे थे कि हुसैन को फरात के किनारे शहीद कर दिया जायेगा। फिर उन्होने मुझसे कहा कि अगर आप चाहें तो मैं आप को उस मिट्टी की खुशबू सुंघा सकता हूं? मैने हां में जवाब दिया तो उन्होने अपना हाथ बढ़ाकर एक मुठ्ठी भरकर मिट्टी उठाई और मुझे दे दी। बस उस वक्त से अपने आंसुओं पर मुझे काबू नही है। (मसनद अहमद 648)
➤ यही नही नबी स0 के वफात के बाद भी आलमे बरजख में भी गमगीन हैं। ह0 इब्ने अब्बास रजि0 ख्वाब में नबी स0 को देखा और बयान किया। सहाबिए रसूल का ख्वाब सच्चा ही होता है और नबी का फरमान भी है -
☞ जिस शख्स ने मुझे ख्वाब में देखा तो बिलाशुबा उसने मुझे देखा क्योंकि शैतान मेरी सूरत में नही आ सकता। (सहीह बुखारी 110, 6993 सहीह मुस्लिम 5919, 5920, अबूदाउद 5023)
☞ ह0 इब्ने अब्बास रजि0 कहते हैं कि मैने एक मरतबा रसू0स0 को ख्वाब में देखा कि आपके बाल बिखरे हुए और जिस्म पर गर्द व गुबार था। आप स0 के पास एक बोतल थी जिसमें वह कुछ तलाश कर रहे थे। मैने अर्ज किया या रसूलल्लाह यह क्या है? आप स0 ने फरमाया यह हुसैन और उसके साथियों का खून है। मै सुबह से इसको इकट्ठा कर रहा हूं। हदीस के रावी अमार कहते कि हमने वह तारीख अपने जहन में रखी। बाद में पता चला ह0 हुसैन रजि0 उसी दिन व तारीख को शहीद किये गये थे। (मसनद अहमद 2165)
सोग, नोहा और मातम
☞ हजरत उम्मे सलमा रजि0 फरमाती हैं मैने हुसैन बिन अली रजि0 पर जिन्नों को नोहा करते हुए सुना। (तबरानी 2793)
➤ गम हर मुसलमान को हुसैन रजि0 के साथ हुए जुल्म को याद करके हो ही जायेगा। पर सोग नही किया जा सकता। क्योकि सोग हराम है-
☞ रसू0स0 का फरमान है कि किसी औरत का जो आखिरत पर ईमान रखती हो उसके लिए जायज नही कि किसी मय्यत पर तीन दिन से ज्यादा सोग करे। लेकिन शौहर का सोग चार महीने दस दिन तक है। (सहीह बुखारी 1280, 1281, 1282, 5334, 5339, 5345)
➤ सोग उसको कहते जिसमें कुछ अमल गम की वजह से रोक दी जाय। मसलन औरत के लिए सिंगार यानी मेकप वगैरह नही करती या कोई शादी वगैरह या किसी और चीज का प्रोग्राम सोग की वजह से रद्द कर दी जाती है। या मुल्क में किसी शख्सियत का इंतकाल होने पर कालेज अीर दफ्तरों को कुछ दिन सोग के लिए बंद कर दिया जाता है। गम तो हमेशा ही जख्म याद करके रहता है पर दुनियाबी काम नही रोका जाता। हां गम और सोग में नोहा करना और मातम करना दोनों हराम है। यह बात तकरीबन सारी अहादीस कुतुब में मौजूद है।
☞ अब्दुल्लाह बिन मसूद रजि0 से रिवायत है कि रसू0 स0 ने फरमाया जो औरतें (किसी के मौत पर) अपने चेहरे को पीटती और गिरेबान को चाक करती हैं और जाहिलियत की बातें बकती हैं वो हम से नही है। (सहीह बुखारी 1294, 1297, 1298, 3519, सहीह मुस्लिम 285, तिर्मिजी 999, इब्ने माजा 1584 निसाई 1860, 1863)
☞ सहीह मुस्लिम की एक रिवायत में है कि रसू0स0 ने फरमाया मेरी उम्मत चार जाहिलाना काम ऐसी हैं जो नहीं छोड़ेगे। उसमें चौथा नोहा करना ही है। नोहा करने वाली बिना तौबा अगर मर गई तो रोजे कयामत गंधक की कमीज और खारिस का कुर्ता होगा। (मिश्कात 1727)
☞ हजरत अबू सईद खुदरी रजि0 से रिवायत है उन्होने की कहा : रसू0स0 ने नोहा करने वाली और उसे सुनने वाली पर लानत फरमाई है। (अबूदाउद 3128)
☞ उम्मे सलमा रजि0 बयान करती हैं जब अबू सलमा रजि0 फौत हुए तो मैने कहा परदेशी शख्स परदेश में फौत हो गया, मै इस मरतबा इस कदर रोउगी कि खूब चर्चा हो। मै इस पर रोने की पूरी तैयारी कर चुकी थी कि एक औरत आई वह रोने में मेरा साथ देना चाहती थी। रसू0स0 उस औरत की तरफ मुतवज्जो हुए और फरमाया क्या तुम ऐसे घर में शैतान दाखिल करना चाहती हो जहां से अल्लाह ने उसे निकाल बाहर किया है। आप स0 ने दूसरी मर्तबा भी ऐसे फामाया। पस मै रोने से रुक गई और मै न रोई। (सहीह मुस्लिम 2134)
☞ ह0 उम्मे अतिया रजि0 से रिवायत है उन्होने कहा : बेशक, रसू0स0 ने हमें नोहा करने से मना फरमाया है। (सहीह बुखारी 7215, अबूदाउद 3127)
➤ कुछ लोग ह0 आयशा रजि0 की उस हदीस को बयान करते हैं जिसमें नबी स0 की वफात पर नोहा की थी। लेकिन उसी हदीस में हजरत आयशा रजि0 ने अपनी गलती मानकर रुजू किया है। कुछ लोग हजरत हम्जा रजि0 की शहादत पर नबी स0 का नोहा करने का सबूत पेश करते हैं। जबकि उस वक्त नोहा हराम नही हुआ था जैसे शराब पहले हराम नही थी। बाद में हराम हुई तो हराम समझा गया। अल्लाह सबको सही समझ अता करे और सही अमल करने की तौफीक दे। आमीन!
हजरत हसन व हुसैन रजि0 के फ़ज़ाइल
आपका भाई - इकबाल अहमद
मोबाइल नं0- 9935873527
