बिस्मिल्लाहिर्रहमानीर्रहीम
अस्सलाम अलैकुम व रहमतुल्लाह बरकातहु
बच्चों का रोजा
बच्चों के रोजे रखने के लिए कोई जोर जबरदस्ती नहीं यानी नाबालिग बच्चे और बच्चियों पर रमजानुल मुबारक के रोजे फर्ज नही हैं लेकिन वालदैन और बड़ों को चाहिए कि वह अपने बच्चों को रोजे रखने को कहें। बशर्ते वह रोजा रख सकते हो। अगर रोजा रखने की ताकत न हो तो मजबूर न करें। फिर भी कोशिश करते रहें कि बच्चे रोजा रखें। अगरचे किसी बच्चे की उम्र 12 या 15 हो जाय या एहतलात (स्वप्नदोष, Night fall) होना शुरू हो जाय तो बच्चा बालिग समझा जायेगा। इसी तरह बच्चियों की जब मासिक (माहवारी) शुरू हो जाय तो बच्चियों को बालिग समझा जायेगा। अब इन पर रमजान के रोजे फर्ज हो गये जिसे छोड़ना गुनाह है। फिलहाल हम यहां नाबालिग बच्चों के रोजे रखने की बात कर रहे हैं। असहाब के दौर में भी नाबालिग बच्चे रोजा रखा करते थे और जब बच्चे भूख और प्यास से रोते तो उनके वालदैन उनको खिलौने दे कर बहलाया करते थे या कही बाहर घूमने फिरने के लिए और मस्जिद ले जाया करते थे ताकि बच्चे रोजा पूरा कर सकें। और रोजा रखने की आदत पड़ जाये। रोजा की मुहब्बत इनके दिल में पैदा हो जाय और जोक व शौक से अल्लाह तआला की रजा और खुशनूदी की खातिर बाद में भी रोजों की पाबंदी किया करें। जिन बच्चों को उनके वालदैन रोजे रखवाते हैं उन बच्चों को उनको अजरो सबाब कई गुना ज्यादा मिलता है। यह अल्लाह तआला का बड़ा एहसान और इनाम है कि वह उन मासूम बच्चों के रोजे पर बेइन्तिहा अजरो सबाब अता फरमाता है और उनके वालदैन और बड़ों को भी जो बच्चों को रोजे की तरफ रागिब करते हैं उन्हें भी इसका अज्र मिलता है।
बुखारी में मौजूद बच्चों के रोजे के बयान में फरमाते हैं कि सय्यदना उमर रजि0 रमजान में एक ऐसे आदमी जो शराब पिये हुआ था उसको मार रहे थे और कह रहे थे बदबख्त हमारे तो बच्चे भी रोजे से हैं और तुम नशे में मस्त हो। इसके बाद रवीय बिन्त मऊज रजि0 ने इब्ने अफरा की यह बात नकल की ‘वह कहती हैं ‘‘हम अपने बच्चों से रोजे रखवाते और उनके लिए रुई और ऊन के खिलौने बनाकर रखते थे और जब कोई बच्चा भूख की वजह से खाने के लिए रोता तो यह खिलौने उसे दे देते ताकि वह खेल में मसगूल होकर बहल जायें, यहां तक कि इफ्तार का वक्त हो जाता। सहीह मुस्लिम में ये अल्फाज इस तरह है कि ‘फिर हम उन्हें अपने साथ ले जाते जब वह हमसे खाने के बारे में पूछते तो हम उनके खिलौने दे देते ताकि वह उनमें बहल जायें और इस तरह अपने रोजे पूरा कर लें।
अपनी राय - हकीकतन अगर देखा जाय तो घर में जैसा माहौल होता है बच्चे भी वैसे ढलते हैं। घर में अगर सारे बड़े रोजा रखेगे तो बच्चे भी शौकयन रोजा रखने के लिए कोशिश करेगे। ऐसे में बड़ों को चाहिए कि बच्चों को रोजा रखने दें और हौसलाअफजाई करते रहें। अगर बच्चों को दिन गुजारने में ज्यादा तकलीफ हो और समझाने के बावजूद भी रोजा तोड़ना चाहे तो तोड़ने दे। लेकिन रोजा इफ्तार के बाद प्यार और मोहब्बत से उसकी गलती का एहसास दिलाएं कि देखो अगर रोजा न तोड़े होते तो तुम्हारा ये रोजा हो गया होता। इन्शाअल्लाह बच्चे दूसरे दिन रोजा पूरा करने की जरूर कोशिश करेगें।
