बिस्मिल्लाहिर्रहमानीर्रहीम
माहे-रमजान के मसायल
अस्सलाम अलैकुम व रहमतुल्लाह बरकातहु
रोजा हर मुसलमान बालिग आकिल मर्द और औरत पर फर्ज है। रोजा को अरबी में सोम कहते हैं। सोम के माने "रुकना” होता है। सरीयत में सुबह सादिक से सूरज के गुरूब होने तक नियत के साथ खाने पीने और नफ्सानी ख्वाहिसात से रुके रहने को सोम यानी रोजा कहते हैं। रोजा रखना अल्लाह तआला के नजदीक अजीमुस्सान अमल है। रोजे की फरजियत का हुक्म 2 हिजरी में नाजिल हुआ। अल्लाह कुरान में फरमाता है- जो कोई भी तुम में से इस महीने को पाये उसको चाहिए कि वह रोजा रखे। अगर कोई बीमार हो या मुसाफिर तो उसे दूसरे दिनों में गिनती पूरी करे। (सू0 बकरा आ0 185)
ह0 आयशा रजि0 ने कहा हम्जा बिन उमर रजि0 ने रसू0 से सफर में रोजा के मुताल्लिक पूछा तो आप स0 ने फरमाया चाहे रखो चाहे न रखो। (सहीह मुस्लिम ह0 2625)
रोजा क्यों फर्ज किया गया और इसका हकीकी मकसद या फायदा क्या है? वैसे तो इस्लाम से पहले भी रोजा फर्ज था। अल्लाह फरमाता है- ऐ ईमान वालों तुम पर रोजे फर्ज किये गये जैसा कि तुम से पहले लोगों पर फर्ज किये गये थे ताकि तुम मुत्तकी परहेजगार बन जाओ। (सू0 बकरा आ0 183)
मतलब ये कि तकवा और अल्लाह से डरना ही रोजे का मकसद है। अगर अल्लाह का डर न हो और गुनाह चाहे छोटा हो या बड़ा अगर न छोड़े यानी अपने नफ्स और ख्याहिसात को काबू में न रखे तो ऐसे शख्स को रोजा रखने की जरूरत नहीं। नबी स0 का इरशाद है- रोजा सिर्फ खाने पीने से परहेज का नाम नही बल्कि हर किस्म के गुनाहों फिजूल और गलत कामों से दूर रहने का नाम रोजा है। (सहीह इब्ने खजीमा)
रसू0 स0 ने इरशाद फरमाया जो शख्स रोजा रखकर भी झूठ बोलना और उस पर अमल करना न छोड़े तो अल्लाह तआला को महज किसी के भूखे प्यासे रहने की जरूरत नही। (सहीह बुखारी ह0 1903, अबूदाउद ह0 2362)
रोजे के फजाइल
अबूहुरैरह रजि0 से मरवी- रसू0 स0 ने फरमाया जिसने रमजान के रोजे ईमान के साथ और सबाब की नियत से रखे उसके अगले तमाम गुनाह माफ कर दिये जाएगें। (सहीह बुखारी ह0 1901, इब्नेमाजा ह0 1641)
अबूहुरैरह रजि0 से मरवी- रसू0 स0 ने फरमाया इन्सान की हर नेकी दस गुना से सात सौ गुना तक बढ़ा दी जाती है। अल्लाह तआला फरमाता है सिवाय रोजे के इसलिए कि वह मेरे लिए खास है और मैं ही इसका बदला दूंगा। आदमी अपनी ख्वाहिश और खाना मेरे लिए छोड़ देता है। रोजेदार के लिए दो खुशियां हैं- एक इफ्तार के वक्त और दूसरी अपने रब से मिलने के वक्त। और रोजेदार के मुंह की बू अल्लाह तआला के नजदीक मुश्क की खुशबू से बेहतर है। (इब्ने माजा 1638)
रसू0 स0 ने फरमाया- रोजा जहन्नम की ढाल है। (इब्ने माजा 1639)
रसू0 स0 ने फरमाया- जन्नत का एक दरवाजा है जिसे रयान कहते हैं। कयामत के दिन इस दरवाजे से सिर्फ रोजादार ही दाखिल हो सकेगे और कोई और दाखिल नही हो सकेगा। (सहीह बुखारी ह0 1896, इब्ने माजा 1640)
अबूहुरैरह रजि0 से रिवायत है कि रसू0 स0 ने फरमाया जब रमजान आता है तो जन्नत के दरवाजे खोल दिये जाते हैं और दोजख के दरवाजे बन्द कर दिये जाते हैं और शैतान को बेड़ियों में जकड़ दिया जाता है। (सहीह मुस्लिम ह0 2495, निसाई)
चाँद का मसला
अब्दुल्लाह बिन उमर रजि0 ने बयान किया कि रसू0 स0 ने रमजान का जिक्र किया तो फरमाया कि जब तक चाँद न देखो रोजा शुरू न करो, इसी तरह जब तक चाँद न देख लो रोजा खतम न करो और अगर बादल छा जाये तो तीस दिन पूरे कर लो। (सहीह बुखारी ह0 1906, सहीह मुस्लिम, निसाई)
सेहरी के मसायल
उम्मुलमोमिनीन ह0 आयशा रजि0 से रिवायत हैं कि रसू0 स0 ने फरमाया जिसने फजर होने से पहले रोजे की नियत न की उसका रोजा नही होगा। (सनन अबूदाउद ह0 2454)
अनस बिन मालिक रजि0 से रिवायत रसू0 स0 ने फरमाया कि सेहरी खाओ कि सेहरी में बरकत होती है। (सहीह बुखारी ह0 1923, सहीह मुस्लिम ह0 2549, निसाई)
ह0 उमर बिन आस रजि0 से रिवायत है कि रसू0 स0 ने फरमाया हमारे और अहले किताब के रोजे में सेहरी का फर्क है। (सहीह मुस्लिम ह0 2550, निसाई)
ह0 जैद बिन साबित से मरवी है कि नबी स0 के हमने सेहरी खाई फिर आप स0 सुबह की नमाज के लिए खड़े हुए। मैने पूछा कि सेहरी और अजान में कितना फासला होता था तो उन्होंने कहा कि पचास आयतें (पढ़ने) के मुवाफिक फासला होता है।(सहीह बुखारी ह0 1921)
अबूहुरैरह रजि0 कहते हैं कि रसू0 स0 ने फरमाया तुम में से कोई जब सुबह की अजान सुने और (सेहरी का) बरतन उसके हाथ में हो तो उसे अपनी जरूरत पूरी किये बगैर न रखे। (सनन अबूदाउद ह0 2350)
इफ्तार के मसायल
हजरत उमर रजि0 बयान करते हैं कि रसू0 स0 ने फरमाया जब रात इस तरफ (मशरिक ) से आये और दिन इधर (मगरिब) में चला जाये कि सूरज डूब जाये तो रोजे के इफ्तार का वक्त आ गया। (सहीह बुखारी ह0 1954, अबूदाउद ह0 2351)
सलमान बिन आमिर रजि0 कहते हैं रसू0 स0 ने फरमाया जब तुम में से कोई रोजे से हो तो उसे खजूर से रोजा इफ्तार करना चाहिए अगर खजूर न पाए तो पानी से कर ले इसलिए कि वह पाकीजा है। (सनन अबूदाउद ह0 2355)
अनस बिन मालिक रजि0 कहते हैं रसू0 स0 नमाज मगरिब पढ़ने से पहले चन्द ताजा खजूरों से इफ्तार करते थे अगर ताजा खजूरें न मिलती तो खुश्क खजूरों से इफ्तार कर लेते और अगर खुश्क खजूरें भी न मिल पाती तो चन्द घूंट पानी नोश फरमा लेते। (सनन अबूदाउद ह0 2356)
सहल बिन साद से रिवायत है कि रसू0 स0 ने फरमाया मेरी उम्मत के लोगों में उस वक्त तक खैर बाकी रहेगी जब तक वह इफ्तार में जल्दी करते रहेगे। (सहीह बुखारी ह0 1957, सहीह मुस्लिम ह0 2554)
अबूहुरैरह रजि0 कहते हैं कि रसू0 स0 ने फरमाया दीन बराबर गालिब रहेगा जब तक कि लोग इफ्तार में जल्दी करते रहेंगे क्योंकि यहूद व नसारा इसमें ताखीर करते हैं। (सनन अबूदाउद ह0 2353)
अबूअतीह कहते हैं कि मै और मसरूक दोनों उम्मुल मोमिनीन ह0 आयशा रजि0 की खिदमत में हाजिर हुए, हमने कहा उम्मुलमोमिनीन! मुहम्मद स0 के असहाब में से दो आदमी हैं इनमें एक इफ्तार भी जल्दी करता है और नमाज भी जल्दी पढ़ता है। और दूसरा इन दोनों चीज में ताखीर करता है। उम्मुल मोमिनीन ह0 आयशा रजि0 ने पूछा उन दोनों में इफ्तार और नमाज में जल्दी कौन करता है? हमने कहा वह अब्दुल्लाह यानी इब्ने मसूद रजि0 हैं, उन्होंने कहा रसू0 स0 ऐसा ही करते थे। (सहीह मुस्लिम ह0 2556, सनन अबूदाउद ह0 2354)
इफ्तार की दुवा
माज बिन जहरा से रिवायत- रसू0 स0 जब रोजा इफ्तार करते तो यह दुवा पढ़ते, (अल्लाहुम्मा लका सुमतो व अला रिज्कका अफ्तरतो) ऐ अल्लाह मैने तेरी ही खातिर रोजा रखा और तेरे ही रिज्क से इफ्तार किया। (सनन अबूदाउद ह0 2358)
रोजा नही टूटता
आमिर बिन रबिया रजि0 कहते हैं कि मैने रसू0 स0 को रोजे की हालत में मिश्वाक करते देखा जिसे मैं न गिन सकता हूं न सुमार कर सकता हूं। (सनन अबूदाउद ह0 2364)
अब्दुल्लाह बिन अबूबकर बिन अनस रजि0 कहते हैं कि अनस बिन मालिक रजि0 सुरमा लगाते थे और रोजे से होते थे। (सनन अबूदाउद ह0 2378)
उम्मुलमोमिनीन ह0 आयशा रजि0 कहती हैं कि रसू0 स0 ने सुरमा लगाया और आप स0 रोजे से थे। (इब्ने माजा ह0 1678)
अबूहुरैरह रजि0 कहते हैं कि रसू0 स0 की खिदमत में एक शख्स आया और अर्ज किया अल्लाह के रसूल! मैने भूलकर खा पी लिया और मै रोजे से था। तो आप स0 ने फरमाया तुम्हें अल्लाह तआला ने खिलाया पिलाया।(सनन अबूदाउद ह0 2398)
अबूहुरैरह रजि0 से रिवायत - रसू0 ने फरमाया जब कोई भूल गया और कुछ खा पी लिया तो उसे चाहिए कि अपना रोजा पूरा करे। क्योंकि उसको अल्लाह ने खिलाया पिलाया। (सहीह बुखारी ह0 1933)
मसाइल1- रोजे की हालत में कपड़ा तर करके जिस्म पर डालना, खाने का नमक मालूम करने (चखने) के लिए जबान पर रखना फिर कुल्ली कर लेना, ठण्ड हासिल करना, तेल लगाना, कंघा करना, हौज में नहाना और गोते लगाना, मिश्वाक करते में गलती से थूक निगल जाना इन सब चीजों से रोजा नही टूटता। (सहीह बुखारी जिल्द 3, सफा 189)
मसाइल2- खुद एहतलाम हो जाना, इफ्तार के बाद से लेकर सेहरी खतम के पहले बीबी से जमाअ जायज है। और जमाअ के बाद सो जाना और फजर से पहले नहाना दुरुस्त है। (सहीह बुखारी ह0 1930)
तुम्हारे लिए हलाल की गई तुम्हारी बीबियाँ रोज़े की रातों में। (सू0 बकरा आ0 187)
ह0 आयशा रजि0 ह0 उम्मे सलमा रजि0 दोनों बीबियों से रसू0 स0 की मजकूर है कि दोनों ने फरमाया कि रसू0 स0 को सुबह हो जाती थी जनाबत की हालत में बगैर एहतलाम के रमजान में और फिर रोजा रखते थे। (सहीह मुस्लिम ह0 2592)
उम्मुलमोमिनीन ह0 आयशा रजि0 कहती हैं कि रसू0 स0 रोजे की हालत में बोसा लेते और साथ में सोते लेकिन आप स0 अपनी ख्वाहिश पर सबसे ज्यादा काबू रखने वाले थे। (सहीह मुस्लिम ह0 2576, सनन अबूदाउद ह0 2382)
अबूहुरैरह रजि0 कहते हैं कि रसू0 स0 ने फरमाया जिस को कय (उल्टी) हो जाय और वह रोजे से हो तो उस पर कजा नही। हां अगर खुद कय की तो कजा करे। (सनन अबूदाउद ह0 2380)
ह0 अबूहुरैरह रजि0 ने कहा एक शख्स जमाअ कर बैठा रमजान में और रसू0 स0 से पूछा तो आप स0 ने फरमाया तु एक गुलाम या लौंडी आजाद कर सकता है? उसने कहा नहीं, आप स0 ने फरमाया दो महीने रोजे रख सकता है? उसने कहा नही, आप स0 ने फरमाया साठ मिस्कीनों को खाना खिला दे। (सहीह मुस्लिम ह0 2597)
