अबू-तालिब का ईमान
![]() |
| अबू-तालिब का ईमान |
बिस्मिल्लाहिर्रहमानीर्रहीम
अस्सलाम अलैकुम व रहमतुल्लाह बरकातहु
यहाँ पर सिर्फ अबू-तालिब के ईमान के मुताल्लिक सारी आहदीस को इकठ्ठा किया गया है।
मुसय्यिब बिन हज़्न रजिo - जब अबू-तालिब की वफ़ात का वक़्त क़रीब हुआ तो नबी
करीम (सल्ल०) उन के पास तशरीफ़ ले गए। उस वक़्त वहाँ अबू-जहल भी बैठा हुआ था। नबी
करीम (सल्ल०) ने फ़रमाया, ‘’चचा! कलिमा ला-इला-ह इल्लल्लाह एक मर्तबा कह
दो अल्लाह की बारगाह में (आपकी बख़्शिश के
लिये) एक यही दलील मेरे हाथ आ जाएगी।“ इस पर अबू-जहल
और अब्दुल्लाह-बिन-उबई उमैया ने कहा : ऐ अबू-तालिब! क्या अब्दुल-मुत्तलिब के दीन से
तुम फिर जाओगे ! ये दोनों उन ही पर ज़ोर देते रहे और आख़िरी कलिमा जो उनकी ज़बान से
निकला वो ये था कि मैं अब्दुल-मुत्तलिब के
दीन पर क़ायम हूँ। फिर नबी करीम (सल्ल०) ने फ़रमाया कि मैं उनके लिये उस वक़्त तक
मग़फ़िरत तलब करता रहूँगा जब तक मुझे उस से मना न कर दिया जाएगा। चुनांचे (सूरा तौबा113
में) ये आयत नाज़िल हुई। ماكانللنبيوالذينآمنواأنيستغفرواللمشركينولوكانواأوليقربىمنبعدماتبينلهمأنهمأصحابالجحيم नबी के लिये और मुसलमानों के लिये मुनासिब नहीं
है कि मुशरेकीन के लिये दुआ मग़फ़िरत करें चाहे वो उन के नाते वाले ही क्यों न हों,
जबकि उन के सामने ये बात वाज़ेह हो गई कि वो दोज़ख़ी हैं।‘’ और सूरा क़सस :56 मैं ये आयत नाज़िल हुई। إنكلاتهديمنأحببت बेशक जिसे आप चाहें हिदायत नहीं कर सकते। (सहीह बुखारी 1360, 3884, 4675, 4772, 6681– सहीह मुस्लिम 132 – निसाई 2037–
मुसनदअहमद 24074)
सय्यदना अबूहुरैरा से रिवायत - रसूलुल्लाह (सल्ल०) ने अपने चचा ( अबू-तालिब )
से कहा : आप ‘ला इला-ह इल्लल्लाह’ (कोई माबूदे-बर-हक़ नहीं है सिवाए अल्लाह के) कह
दीजिये, मैं आपके ईमान की क़ियामत के दिन गवाही दूँगा, उन्होंने कहा: अगर
ये डर न होता कि क़ुरैश मुझे ताना देंगे कि मौत की घबराहट से उसने इस्लाम क़बूल कर लिया है तो मैं
तुम्हारे सामने ही इस कलिमे का इक़रार कर लेता, तो इसपर अल्लाह तआला ने ये आयत
नाज़िल फ़रमाई: (إنكلاتهديمنأحببتولكناللهيهديمنيشاء) ' आप जिसे चाहें
हिदायत नहीं दे सकते बल्कि अल्लाह हिदायत
देता है जिसे चाहता है, (अल-क़सस: 56)। इमाम तिरमिज़ी
कहते हैं: ये हदीस हसन ग़रीब है। हम इसे सिर्फ़ यज़ीद-बिन- कैसान
की रिवायत से जानते हैं। (सहीह मुस्लिम 134, 135 –तिरमिजी 3188 – मुसनद अहमद 9608, 9685)
हज़रत अली (रज़ि०)
से रिवायत है कि मैं नबी ﷺके पास गया और
कहा : अबू-तालिब वफ़ात पा गए हैं। आपने फ़रमाया:
जाओ उन्हें दबा आओ। हज़रत अली
(रज़ि०) ने कहा : बेशक वो मुशरिक वफ़ात पाए हैं। आपने फ़रमाया: जाओ उसे दबा आओ। जब मैंने उन्हें दबा दिया तो मैं आप ﷺके पास वापस आया। आपने
मुझ से फ़रमाया: ग़ुस्ल करो। (निसाई 190 - मुसनद अहमद 759. 1093)
हज़रत अली (रज़ि०)
से नक़ल हुई है कि (जब मेरे वालिद अबू-तालिब वफ़ात पाए तो) मैंने नबी ﷺसे गुज़ारिश की कि आपके
गुमराह चचा वफ़ात पा गए हैं। अब उन्हें कौन (ज़मीन में) छिपाए (दफ़्न करे) गा? आपने
फ़रमाया: जाओ अपने वालिद को (ज़मीन में) छिपाओ (दफ़्न करो), और
मेरे पास वापस आने से पहले कोई और काम न करना।
मैं उनको दफ़नाने के बाद आप के पास हाज़िर हुआ तो आपने मुझे ग़ुस्ल करने का
हुक्म दिया। मैंने ग़ुस्ल क्या तो आपने मेरे लिये (सब्र और बर्दाश्त की) दुआ की
लेकिन वो दुआ मुझे याद नहीं। (अबूदाऊद 3214 - निसाई 2008 - मुसनद अहमद 807. 1074)
हज़रत अब्बास बिन अब्दुल मुत्तलिब(रजिo) ने बयान किया उन्होंने नबी करीम (सल्ल०) से पूछा आप अपने चचा (अबू-तालिब)
के क्या काम आए कि वो आपकी हिमायत किया करते थे और आप (सल्ल०) के लिये ग़ुस्सा होते
थे? आप (सल्ल०) ने फ़रमाया, ‘’(इसी वजह से) वो सिर्फ़ टख़नों तक जहन्नम में हैं
अगर मैं उन की सिफ़ारिश न करता तो वो दोज़ख़ की तह में बिल्कुल नीचे होते।“(सहीह बुखारी 3883, 6208, 6572 - सहीह मुस्लिम 510, 511, 512 - मुसनदअहमद 1763, 1768, 1774, 1789)
अबू सईद खुदरी(रजिo) उन्होंने नबी करीम (सल्ल०) से सुना आप (सल्ल०) की मजलिस में आपके चचा का ज़िक्र हो
रहा था। तो आप (सल्ल०) ने फ़रमाया, ‘’शायद क़ियामत के दिन उन्हें मेरी शफ़ाअत काम आ
जाए और उन्हें सिर्फ़ टख़नों तक जहन्नम में रखा जाए जिससे उन का दिमाग़ खौलेगा।“ हम से इब्राहीम-बिन-हमज़ा ने बयान किया
कहा हम से इब्ने- अबू-हाज़िम और दरा वर्दी ने बयान किया यज़ीद से उसी मज़कूरा
हदीस की तरह अलबत्ता इस रिवायत में ये भी
है कि अबू-तालिब के दिमाग़ का भेजा उस से खौलेगा। (सहीह बुख़ारी 3885, 6564 – सहीह मुस्लिम
513 – मुसनद अहमद 11073, 11490, 11540)
हज़रत इब्ने-अब्बास (रज़ि०) बयान करते हैं कि रसूलुल्लाहﷺ ने फ़रमाया : जहन्नम वालों में से सबसे हलका अज़ाब अबू-तालिब को होगा, उसने आग के दो जूते पहने होंगे उनसे उसका दिमाग़ खोलेगा। (सहीह मुस्लिम 514, 515 – मुसनद अहमद 2636, 2690 – मिशकात 5668)
हज़रत
उसामा-बिन-ज़ैद (रज़ि०) से रिवायत है,
उन्होंने कहा: ऐ अल्लाह के रसूल! क्या आप मक्का में अपने घर में तशरीफ़
रखेंगे? रसूलुल्लाहﷺने फ़रमाया:
क्या अक़ील ने हमारे लिये कोई मकान या घर छोड़ा है? अबू-तालिब की विरासत अक़ील और तालिब को मिली थी
और हज़रत जाफ़र और अली (रज़ि०) को विरासत में से कुछ नहीं मिला था क्योंकि ये दोनों
मुसलमान थे और अक़ील और तालिब काफ़िर थे। हज़रत उमर (रज़ि०) इसी वजह से कहा करते थे:
मोमिन काफ़िर का वारिस नहीं होता। और हज़रत उसामा (रज़ि०) ने फ़रमाया: रसूलुल्लाहﷺ का इरशाद है:
मुसलमान काफ़िर का वारिस नहीं होता और काफ़िर मुसलमान का वारिस नहीं होता। (सहीह बुखारी
1588, 4283 – सहीह मुस्लिम 3294 – इब्नेमाजा 2730)

