ताजिया नाजायज़ कैसे
अस्सलाम अलैकुम व रहमतुल्लाह बरकातहु
सारी बातों का नतीजा यही है कि रौजे का ढांचा या तस्वीर बनाना जायज़ करार दिया जा रहा है। तो चलो देखते हैं क़ुरआन व हदीस की रोशनी में कि रौजा बनानें का क्या हुकुम है।
☞ हजरत जाबिर रजि0 से रिवायत हैं कि नबी स0 ने कबरों को पुख्ता करने, चूनागच करने, इस पर लिखने, इमारत बनाने और इस पर चलने और बैठने से मना फरमाया है। (सहीह मुस्लिम 2245, तिर्मिजी 1052, अबूदाउद 3225, इब्ने माजा 1562, 1563, सनन निसाई 2029, 2030, 2031)
इस हदीस से यह वाजेह हो रहा है कि क़बर पक्की करना यानी मज़ार बनाना उस पर इमारत यानी रौजा बनाना बिल्क़ुल नाजायज़ है। अब जब असल में रौजा बनाना मना है तो नकली रौजा बनाना कैसे जायज़ होगा। दरअसल बुराई का रास्ता यहीं से खुलता है →
☞ हजरत आयशा रजि0 कहती हैं कि एक बार उम्मे हबीबा रजि0 और उम्मे सलमा रजि0 ने हुजूर स0 से एक गिरजा का जिक्र किया जिसमें तस्वीर थी जिसे हब्शा में दोनों ने देखा था। आप स0 ने फर्माया उन लोगों में जब कोई नेक आदमी मर जाता था तो उसकी कब्र पर मस्जिद बना लेते थे और यह तस्वीर बनाते थे। कयामत के दिन ये लोग खुदा के नजदीक सारी मख्लूक से ज्यादा बुरे होगे। (सहीह बुखारी 427, 434, 1341, 3873, मुस्लिम 1181, मिश्कात 4508)
लोग ताज़िया को अकीदत और एहतराम के साथ रखने में कोई कसर नहीं छोड़ते जब कि यह जाहिलाना अमल है →
☞ हज़रत अबू वाक़िद लैसी (र.अ.) से रिवायत है कि एक मर्तबा वह नबी करीम (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) के साथ ह़ुनैन के लिए निकले, आप (स.अ.) ताज़ा इस्लाम क़ुबूल करने वालों के साथ थे और उस वक़्त हम एक ऐसे पेड़ के पास से गुज़रे जिसे 'ज़ात अनवात्' कहा जाता था और उस पर लोग अपनी तलवारें (फैज़ हासिल करने के लिए ) लटकाया करते थे. रास्ते में हम लोग एक सरसब्ज व सादाब बेरी के अजीम बाग़ से गुजरे तो हमने अर्ज़ किया: ऐ अल्लाह के रसूल, हमारे लिए भी एक 'ज़ात अनवात्' मुक़र्रर कर दीजिये. आप (स.अ.) ने फरमाया: "सुब्हानअल्लाह! क़सम है उस ज़ात की जिसके दस्त-ए-क़ुदरत में मेरी जान है, तुम ने वैसी ही बात कही जैसी बनी इस्राईल ने मूसा (अ.स.) से कही थी कि 'हमारे लिए भी कोई मा'बूद मुक़र्रर कर दीजिये', और हज़रत मूसा (अ.स.) ने फ़रमाया था कि तुम एक जाहिल क़ौम हो. (सूरह आराफ़ 138) याद रखो तुम लोग पिछली क़ौमों के क़दम-ब-क़दम चलोगे और उनकी एक एक आदतें अपनाओगे." (मुसनद अहमद 22242, तिर्मिज़ी 2180, मिश्कात 5408)
क़ुरआन की वह आयत भी मुलाहिज़ा करें जो हदीस में बयान की गई है।
وَجَاوَزْنَا بِبَنِي إِسْرَائِيلَ الْبَحْرَ فَأَتَوْا عَلَىٰ قَوْمٍ يَعْكُفُونَ عَلَىٰ أَصْنَامٍ لَّهُمْ ۚ قَالُوا يَا مُوسَى اجْعَل لَّنَا إِلَـٰهًا كَمَا لَهُمْ آلِهَةٌ ۚ قَالَ إِنَّكُمْ قَوْمٌ تَجْهَلُونَ
और हमने बनी इस्राईल को समुंदर पार करा दिया, तो वे एक ऐसे क़ौम के पास आए जो अपने कुछ बुतों की पूजा कर रही थी। उन्होंने कहा: “ऐ मूसा! हमारे लिए भी एक माबूद बना दो जैसे इनके (बुत) हैं।” मूसा ने कहा: “तुम एक ज़ाहिल क़ौम हो।” (सूरह आराफ़ 138)
إِنَّ هَـٰؤُلَاءِ مُتَبَّرٌ مَّا هُمْ فِيهِ وَبَاطِلٌ مَّا كَانُوا يَعْمَلُونَ
बिलासुबा , ये लोग जिस चीज़ में लगे हुए हैं वह फ़ना होने वाली है, और जो कुछ वे कर रहे हैं वह बातिल है। (सूरह आराफ़ 139)
रसूलल्लाह स0 अ0 ने इसी हदीस में पेशीनगोई भी कर दी है कि तुम लोग पहले की तरह अमल करने लग जाओगे।
☞ ह0 अबूसईद खुदरी रजि0 रिवायत करते हैं कि रसू0स0 ने इर्शाद फरमाया यकीनन तुम भी पहले लोगों के तरीको के पीछे चल पड़ोगे जिस तरह बालिस्त-बालिस्त के साथ और हाथ-हाथ के साथ। हत्ता कि अगर पहले लोगों ने किसी गोह के सुराख में दाखिल होने का काम किया तो तुम भी पीछे चलोगे। पूछा गया या रसू0स0 उन पहले लोगो से मुराद क्या यहूदी और नसरानी हैं? तो आप स0 ने फरमाया अगर वह नही तो फिर कौन मुराद हैं। (सहीह बुखारी 3456,7320, सहीह मुस्लिम 6781, मिश्कात 5361)
नबी स0 जो भी अच्छाई और बुराई थी सब बता चुके हैं। क़ुरआन में अल्लाह तअला फरमाता है →
ऐ ईमान वालों! अल्लाह और उसके रसूल से आगे न बढ़ो। और अल्लाह से डरते रहो। (सू0 49 अल-हुजरात आ0 1)
और जो अल्लाह और उसके रसूल की नाफरमानी करेगा और उसकी मुक़र्रर की हुई हदों से आगे बढ़ेगा उसे अल्लाह आग में डालेगा जिसमें वो हमेशा रहेगा, और उसके लिए रुसवा कर देने वाली सजा है। (सू0 4 निसा आ0 14)
➤ अब रही बात कि कहां मना किया है तो सहीह अहादीस में मुलाहिजा फरमाएं-
☞ हज़रत आइशा रजि0 कहती हैं कि हुजूर स0अ0 ने फरमाया जो शख्स इस दीन में कोई नई बात पैदा करे जो इसमें नही है वह मरदूद (रद) है। (सहीह बुखारी 2697, सहीह मुस्लिम 4492, सनन अबूदाउद 4606, मिश्कात 140)
☞ हज़रत अरबाज बिन सारया बयान करते हैं रसू0स0 ने फरमाया बिलाशुबा तुममें से जो मेरे बाद जिन्दा रहा वह बहुत एख्तलाफ देखेगा। चुनान्चे उन हालात में मेरी सुन्नत और मेरे खुलफा की सुन्नत अपनाए रखना। खुलफा जो असहाब रशद व हिदायत हैं। सुन्नत को मजबूती से थामना बल्कि दाढ़ों (दातों) से पकड़े रहना नई नई बिदआत व अख्तरात से अपने आप को बचाये रखना। बिलाशुबा हर नया काम बिद्अत है और हर बिद्अत गुमराही हैं। (अबूदाउद 4607, तिर्मिजी 2676, मसनद अहमद 17275, इब्ने माजा 43, मिश्कात 165, दार्मी 96)
☞ हजरत जाबिर बिन अब्दुल्लाह कहते हैं कि रसू0स0 जुमा के खुतबे में फरमाते हम्द सलात के बाद बिला शुबा बेहतरीन हदीस (कलाम) अल्लाह की किताब है और जिन्दगी का बेहतरीन तरीका मुहम्मद स0 का तरीका जिंदगी है और दीन में बदतरीन काम वह हैं जो खुद निकाले गये हों और हर नया निकाला हुआ काम गुमराही है। (सहीह मुस्लिम 2005, मिश्कात 141)
☞ हजरत अब्दुल्लाह इब्ने मसऊद रजि0 बयान करते हैं कि रसू0स0 ने फरमाया तमाम कलामों से बेहतर किताबुल्लाह है और तमाम हिदायतों से बेहतर मुहम्मद स0 की हिदायत है। देखो- नए जारी किये कामों से बचो, क्योंकि ये बिदअत है और हर बिदअत गुमराही है। (इब्ने माजा 46)
☞ अब्दुल्लाह बिन मसऊद रजि0 ने कहा सबसे अच्छी बात किताबुल्लाह है और सबसे अच्छा तरीका मुहम्मद स0 का है। और सबसे बुरी बात दीन में नई बात (बिद्अत) पैदा करना है। (सहीह बुखारी 7277, 6098)
तो आज लोग ताज़िया बनाकर पिछली कौमों की तरह अमल कर रहे हैं। अल्लाह हम सब को हर बुरे अमल से दूर रखे। आमीन !
