शाबान और शब-ए-बारात
बिस्मिल्लाहिर्रहमानीर्रहीम
इसमें कोई शक नही कि माहे शाबान फजीलत वाला महीना है। साल के बारह महीनों में बाज को बाज पर फौकियत और फजीलत व बर्तरी हासिल है।दरअसल शबे बारात में शब फ़ारसी और बराअत अरबी लफ्ज़ है। शब का मतलब रात और बराअत के माने नफरत और बेज़ारी जाहिर करने के होते है। माहे शाबान के बारे में रिवायात से रसू0 स0 का यह मामूल मालूम होता है कि आप स0 इस माह कसरत से रोजे रखा करते थे।
उम्मुल मोमनीन ह0 आयशा रजि0 फरमाती हैं कि रसू0 स0 रमजान के रोजे के अलावा सबसे ज्यादा जिस माह में रोजा रखते थे वह शाबान का महीना होता था। (मुत्तफिक अलैह)
हजरत उम्मे सलमा रजि0 फरमाती हैं कि मैने रसू0 स0 को दो महीने पे दर पे रोजा रखते हुए सिवाय शाबान और रमजान के नही देखा। (तिर्मिजी)
हजरत अनस रजि0 बयान करते हैं कि रसू0 स0 से दर्याफ्त किया गया कि रमजान के बाद किस महीने में रोजा रखना अफजल है तो आप स0 ने फरमाया शाबान में। फिर आप स0 से सवाल किया गया कि किस महीने में सदका करना अफजल है तो आप स0 ने फरमाया रमजान में। (तिर्मिजी)
सहीय इब्ने खजीमा और मसनद अहमद बिन हम्बल की रिवायत है- सय्यदना उसामा रजि0 फरमाते है कि मैंने दरयाफ्त किया या रसू0 स0 क्या बात है आप किसी और महीने में इस कसरत से रोजे नही रखते जितनी कसरत से माहे शाबान में रोजे रखते हैं? रसू0स0 ने जवाब में इरशाद फरमाया- यह वह महीना है जो रजब और रमजान के दरम्यान है लोग इस महीने के बारे में गफलत में पड़े रहते हैं जबकि इस महीने में लोगो के आमाल अल्लाह तआला के सामने पेश किये जाते हैं। मैं चाहता हूं कि जब मेरा आमाल अल्लाह के सामने पेश हो तो मै रोजे से रहूं। (सनन निसाई ह0 1359, अबूदाउद)
इन रिवायात से शाबान के महीने में कसरत से नफिल रोजा रखने की फजीलत मालूम होती है।
अलबत्ता अगर कोई ” अय्यामे बैद “ 13, 14, 15, तारीख के रोज़े रखता हो तो इस दिन रोज़ा रखने में बुराई नहीं। इसलिए कि हदीस में आया है -
अबूज़र रज़ि. से रिवायत है कि रसूल सल्ल. ने फ़रमाया “जब रोज़ा रखे तो महीने में तीन दिन रोज़े रखो 13-14 और 15 तारीख में”। (तिर्मिज़ी ह0 658, नसाई ह0 2408)
अबु हुरैरा रज़ि. से रिवायत है कि अल्लाह के रसूल सल्ल. ने फ़रमाया ‘’जब शअबान का आधा महीना बाकी रह जाए तो रोज़ा न रखो । (तिर्मिज़ी ह0 635, इब्नेमाजा ह0 1651)
इस महीने के पंद्रहवीं शब (रात) के बारे में कुतुब अहादीस के जखीरे में मिलती है लेकिन अक्सर व बेस्तर सनद के लिहाज से निहायत कमजोर और जईफ रिवायात हैं। हत्ता कि बाज अहले इल्म से यह भी मन्कूल है कि शाबान की पंद्रहवीं शब की फजीलत के सिलसिले में कोई एक सहीय हदीस भी वारिद नही ताहिम बाज रिवायात दरजये हसन की भी हैं जो काबिले कबूल और लायके अमल होती है। मसलन यह हदीस- कि इस रात अल्लाह तआला अपने बन्दों पर तजल्ली फरमाता है और बाज नाफरमानों को छोड़कर बाकी बन्दों की दुआएं कबूल करता और इनकी मग्फिरत फरमाता है।
कुरान पाक में इस रात का कोई जिक्र नही। सूरह दखान में अल्लाह फरमसता है- बेशक नाजिल फरमाया हमने इसको एक मुबारक रात में। इस आयत को बाज हजरात शाबान की पंद्रहवी शब मुराद ली है लेकिन जम्हूर सहाबए किराम और मुफस्सरीन का कौल यही है कि मुबारक रात से मुराद शबेकद्र है। इमाम करतबी और मशहूर मुफस्सिर इब्ने कसीर रह0 ने भी अपनी तफासीर में इसी राय को इख्तियार किया कि ‘‘लैलतुल मुबारकः और लैलतुल कद्र‘‘ एक ही रात के दो शिफाती नाम हैं जो रमजानुल मुबारक में आती है।
रमजान में नाजिल किया गया कुरान जो हिदायत है लोगो के लिए। (सू0 बकरा आ0 185)
अहादीस में शबेबरात की अजमत व फजीलत और अहमियत को साबित करने के लिए इमाम तिर्मिजी की रिवायत बुनियादी हैसियत की हामिल है जिसमें इस रात रसू0 स0 के कब्रस्तान (जन्नतुल बकीय) जाने का भी जिक्र है लेकिन शकल ये है कि इस रिवायत से यह इशारा मिलता है कि रात को जाग कर मस्जिद में इज्तमाई इबादत व नवाफिल का एहतमाम किया जाय। फिलहाल काबिले गौर यह है कि रसू0 स0 और सहाबएकिराम के दौर में ऐसे किसी एहतमाम का शबूत नही मिलता।
सय्यदा आयशा सिद्दीक रजि0 बयान करती हैं कि नबी स0 का मामूल था कि जब भी आप स0 बारी के मुताबिक इनके घर आया करते थे तो पिछली रात उठकर कब्रस्तान जाया करते। (मुस्लिम)
अली रजि0 से रिवायत है कि रसू0 स0 ने फरमाया जब नुस्फ (आधा) शाबान की रात आये तो इस रात को कयाम करो और इनको रोजा रखो। इस रात अल्लाह ताला सूरज के गुरूब होते ही पहले आसमान पर नुजूल फरमा लेता है और सुबह सादिक तुलू होने तक कहता रहता है- क्या कोई मुझसे बख्शिश मांगने वाला है कि मै उसे माफ कर दूं? क्या कोई रिज्क तलब करने वाला है कि उसे रिज्क दूं? क्या कोई (किसी बीमारी या मुसीबत) मुब्तला है कि मैं उसे आफियत अता फरमा दूं? (सनन इब्ने माजा ह0 1388)
नोट- ऊपर की हदीस के बारे में तहफुल हौजी शरह तिर्मिजी में बयान किया गया है यह रिवायत बिल्कुल जईफ है और इमाम अहमद रह0 फरमाते हैं कि इसमें एक रावी ऐसा है जो हदीसें खुद बनाता था (नउजबिल्लाह)। इस हदीस के रावी अबूबकर अब्दुल्लाह बिन मुहम्मद हैं जो हदीसें गढ़ लिया करते थे। इसलिए यह हदीस जईफ बल्कि मौजू है। ( तहफुल हौजी जिल्द 2 सफा 53)
हजरत आयशा रजि0 बयान करती हैं कि आप स0 ने फरमाया ऐ आयशा क्या तुम जानती हो कि यह कौन सी रात है? मैने अर्ज किया अल्लाह और उसके रसूल ज्यादा जानते हैं। आप स0 ने फरमाया कि आज शाबान की पंद्रहवीं तारीख है इस शब में अल्लाह तआला अपने बन्दों की तरफ रहमत से देखता है और माफी चाहने वालों को माफ करता है और रहम चाहने वालों को रहम फरमाता है और बुग्ज रखने वालों को इनकी हालत पर छोड़ देता है।
ऊपर की हदीस बैहकी ने अला बिन हारिस के तरीके से बयान किया है और यह फरमाया कि यह रिवायत मुरसल है यानी हजरत आयशा रजि0 से साबित नही।
एक और हदीस जिसे साहबेकशाफ ने बयान की है कि रसू0 स0 ने फरमाया कि जो शख्स इस पंद्रहवी शाबान की रात में सौ रकातें पढ़ता है तो अल्लाह तआला उसकी तरफ सौ फरिस्ते भेजता है। तीस उसे जन्नत की खुशखबरी देते हैं और तीस उसे अजाबे नार से बचाते हैं और तीस उसे दुनिया की बलाओं से दूर रखते हैं और दस उसे शैतान के मकरो फरेब से बचाते हैं।
ये हदीस भी मौजू है साहबेकशाफ ने इसे बगैर सनद और हवाले के बयान किया है। इसी तरह वह हदीस भी जो हजरत अबूहुरैरह रजि0 से मरफूअन रिवायत की जाती है कि शाबान की पंद्रहवीं तारीख की रात को जो शख्स बारह रकात नमाज इस तरह पढ़ेगा कि हर रकात में ‘‘कुल हो अल्लाह अहद’’ तीस-तीस मरतबा पढ़े वह उस वक्त तक नही मरेगा जब तक कि अपना ठिकाना जन्नत में न देख ले और इसकी सिफारिश इसके घर के दस जहन्नमियों के बारे में कबूल की जायेगी।
इस हदीस को इब्ने जोजी ने रिवायत किया है और कहा है कि यह हदीस मौजू है इसके अलावा वह इब्ने अराक, सेवती इब्ने हजर वगैरह ने भी इस हदीस को मौजू कहा है और इसके रावियों को मजहूल कहा है। (असार अल मरफूअ सफा 33)
उम्मुल मोमिनीन आयशा रजि0 कहती हैं कि मैने एक रात रसू0स0 को गायब पाया तो मै आप की तलाश में बाहर निकली तो क्या देखती हूं कि आप बकीय कब्रस्तान में हैं आप ने फरमाया क्या तुम डर रही थी कि अल्लाह और उसके रसूल तुम पर जुल्म करेगे? मैने अर्ज किया अल्लाह के रसूल! मेरा गुमान था कि आप अपनी किसी बीबी के यहां गये होगे। आप ने फरमाया अल्लाह तआला पंद्रहवीं शाबान की रात को आसमान दुनिया पर नुजूल फरमाता है और कबीला कल्ब की बकरियों के बालों से ज्यादा तादाद में लोगों की मग्फिरत फरमाता है। (सनन तिर्मिजी ह0739, सनन इब्ने माजा ह0 1389)
इस हदीस को इमाम तिर्मिज़ी ने खुद रिवायत करके नीचे लिख दिया मेरे उस्ताद इस्माइल बुखारी (बुखारी शरीफ के मुसन्निफ) ने कमजोर और जईफ कहा है। इब्ने माजा की रिवायत में हज्जाज बिन अरतात-अन-नखाइ है जो जइफ रावी है।
हलवा वगैरह बनाने के सिलसिले में लोग कहते है कि नबी ए करीम स0 का दंदान मुबारक (दाँत) शहीद हुए थे और आप स0 ने इस रोज हलवा तनावल फरमाया था इसलिए उनकी अकीदत में हम लोग भी इस रोज हलवा पकाते और खाते खिलाते हैं। हालांकि यह सरीह गलत है क्योकि आप स0 का दंदान मुबारक जंग-ए-अहद में शहीद हुए थे जो 7शव्वाल 3हि0 में हुई थी। फिर शाबान में यह रस्म क्यों? हकीकतन तो किसी सहीय हदीस से यही नही साबित होता कि हलवा ही तनावल फरमाया था। हां हजरत उवैस करनी रजि0 ने मोहब्बत में अपने दाँत तोड़ लिए थे फिर मजबूरन हलवा (पिसा हुआ) खाते थे।
मेरे भाइयों हलवा किसी भी दिन खाना पकाना कोई गुनाह का काम नही। हर रोज खूब पकाओ खूब खाओ कोई हर्ज नही पर इसे दीन समझ लेना कि हलवा खाना पकाना ही हमारा मजहब हैं यही दीन है जबकि नबी स0 ने इस बात को दीन इस्लाम में सामिल न किया हो तो यह गुनाह की बात है। दीन में इजाफा करना हुआ। जिसे बिदअत में सुमार किया जायेगा। जो जहन्नम तक ले जायेगी।
कब्रों की ज़ियारत के लिए कब्रस्तान जाते रहना आप सल्ल. की सुन्नत है। हजरत बुरैदा रजि0 से रिवायत है कि रसू0 स0 ने फरमाया कि मैने तुम्हें कबरों की जियारत से मना किया था लेकिन अब तुम कबरों की जियारत किया करो। (सहीह मुस्लिम ह० 5114 )
कब्रिस्तान की ज़ियारत करने से मौत की याद आती है। अबू हुरैरा रजि0 से रिवायत है कि रसू0 स0 ने फरमाया कि तुम कबरों की जियारत किया करो क्यों कि वो तुम्हें मौत की याद दिलाती है। (सही मुस्लिम ह0 2259) एक दूसरी रिवायत में है कि ये तुम्हें आखिरत की याद दिलाती है। (सनन इब्ने माजा ह0 1569)
कबरों की जियारत सिर्फ मरदों के लिए जायज है औरतों के लिए नही। हजरत इब्ने अब्बास रजि0 फरमाते हैं कि रसू0 स0 ने कबरों की जियारत करने वाली औरतों पर लानत फरमाई है। (सनन इब्ने माजा ह0 1575)
कब्रों की जियारत के साथ मुर्दो के लिए दुआ की जाती है, जिससे मुर्दो को फायदा पहुंचता है। लेकिन कब्रों की ज़ियारत के लिए इस रात को ख़ास कर लेना किसी कुरान और सही हदीस से साबित नहीं।
इसी तरह कब्रों पर चिराग जलाना भी नाजायज है। क्योंकि हजरत अब्दुल्लाह बिन अब्बास से रिवायत है कि रसू0 स0 ने कब्रों पर चिराग जलाने वालों पर लानत फरमाई है। (अबूदाउद ह0 1479, तिर्मिजी ह0 280, मिश्कात ह0 682)
यह अकीदह रखना कि चालीस दिन तक या ईदैन को या जुमा को या शबे-बारात को रूहें अपने घर आती हैं। तो अल्लाह तआला का फर्मान है - फिर यकीनन तुम मरोगे। फिर यकीनन कयामत के रोज उठाये जाओगे। (सु0 मोमिनून आ0 15, 16)
मरने के बाद ऐसे आलमें बरजख में हैं जहां से पलट कर कयामत तक नहीं आ सकते। (सू0 मोमिनून आ0 100)
क्या नही देखा उन्होने कितनी हलाक कर डाली हमने इनसे पहले बस्तियां। जो इनकी तरफ लौट कर नही आने वाले। (सू0 यासीन आ0 31
इस आयत का क्या मतलब हुआ जिसमें अल्लाह तआला ने मौत और कयामत के बीच एक और आलम आलमे बरजख रखा है जिसमें जाने के बाद कयामत के ही दिन उठाया जायेगा।
फिलहाल अल्लाह हम सब लोगों को दीन की सही समझ अता करे और अमल करने तौफीक अता करे। आमीन!
